MAHENDRA SIINGH SHEKHAWAT बीकानेर, (समाचार सेवा)। बीकानेर के प्रतिष्ठित उद्योगपति शिवरतन अग्रवाल ‘फ़न्ना बाबू’ का निधन न केवल शहर बल्कि पूरे व्यापारिक जगत के लिए एक अपूरणीय क्षति है। उन्होंने अपने जीवन भर की मेहनत, ईमानदारी और व्यावसायिक प्रतिबद्धता से बीकानेर का नाम राष्ट्रीय ही नहीं, अंतर्राष्ट्रीय स्तर तक पहुँचाया। ऐसे व्यक्तित्व की अंतिम यात्रा गरिमा, शोक और श्रद्धा का प्रतीक होनी चाहिए थी, लेकिन दुर्भाग्यवश यह अवसर भी दिखावे और प्रचार की भेंट चढ़ गया।
अंतिम यात्रा में उमड़ी भीड़ यह दर्शाती है कि फ़न्ना बाबू के प्रति लोगों के मन में सम्मान था, लेकिन इस भीड़ के एक हिस्से ने जिस प्रकार सोशल मीडिया पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराने की होड़ मचाई, उसने पूरे माहौल की गंभीरता को धूमिल कर दिया। कैमरे शोकाकुल परिवार या दिवंगत आत्मा की यात्रा पर केंद्रित होने के बजाय नेताओं और वीआईपी चेहरों पर टिके रहे। ऐसा प्रतीत हुआ मानो यह कोई शोक सभा नहीं, बल्कि प्रचार का मंच बन गया हो। यह प्रवृत्ति केवल एक घटना तक सीमित नहीं है, बल्कि हमारे समाज में तेजी से बढ़ती संवेदनहीनता का संकेत है।
सोशल मीडिया ने जहां अभिव्यक्ति का एक सशक्त माध्यम दिया है, वहीं इसने ‘दिखने’ की एक अंधी प्रतिस्पर्धा भी पैदा कर दी है। हर व्यक्ति और हर माध्यम इस होड़ में शामिल है कि वह किस प्रकार अधिक से अधिक ध्यान आकर्षित कर सके, भले ही उसके लिए अवसर की गरिमा ही क्यों न कुर्बान करनी पड़े।
अंतिम यात्रा केवल एक औपचारिकता नहीं
किसी की अंतिम यात्रा केवल एक औपचारिकता नहीं होती; यह उस व्यक्ति के जीवन, उसके योगदान और उसकी स्मृतियों को सम्मानपूर्वक विदाई देने का क्षण होता है। यह वह समय होता है जब समाज अपनी कृतज्ञता व्यक्त करता है और परिवार के दुःख में सहभागी बनता है। ऐसे में यदि ध्यान का केंद्र बदलकर नेताओं की उपस्थिति या उनके दृश्य बन जाएं, तो यह न केवल अनुचित है बल्कि अमानवीय भी है।
यह सवाल केवल सोशल मीडिया या कुछ व्यक्तियों का नहीं है, बल्कि पूरे समाज के नैतिक पतन की ओर इशारा करता है। क्या हम इतने संवेदनहीन हो चुके हैं कि शोक के क्षणों में भी अवसरवादिता से खुद को अलग नहीं रख पाते? क्या हमारी प्राथमिकताएं इतनी बदल चुकी हैं कि व्यक्ति की गरिमा से अधिक महत्व ‘व्यूज’ और ‘लाइक्स’ का हो गया है?
शोक के क्षणों में संयम, संवेदना और संतुलन ही सबसे बड़ी जिम्मेदारी
आज आवश्यकता इस बात की है कि हम आत्ममंथन करें। मीडिया और सोशल मीडिया से जुड़े लोगों को यह समझना होगा कि हर घटना का एक संदर्भ और एक मर्यादा होती है। शोक के क्षणों में संयम, संवेदना और संतुलन ही सबसे बड़ी जिम्मेदारी होती है।फ़न्ना बाबू जैसे व्यक्तित्व केवल अपने परिवार के नहीं, पूरे समाज की धरोहर होते हैं। उनकी अंतिम यात्रा में उन्हें केंद्र में रखना ही सच्ची श्रद्धांजलि होती। यदि हम यह भी नहीं कर पाए, तो यह केवल एक व्यक्ति के प्रति नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति और संस्कारों के प्रति भी अन्याय है।


