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मासूमों के प्रति जिला प्रशासन का संवेदनशील चेहरा

MAHENDRA SIINGH SHEKHAWAT बीकानेर, (समाचार सेवा)।  निदा फाज़ली की पंक्तियां—“इन नन्हें नन्हें हाथों को कुछ चांद सितारे छूने दो…”—सिर्फ काव्य नहीं, बल्कि समाज के प्रति हमारी जिम्मेदारी का स्मरण कराती हैं। बीकानेर के जिला कलेक्टर निशांत जैन द्वारा भीषण गर्मी को देखते हुए स्कूलों के समय में बदलाव का निर्णय इसी संवेदनशील दृष्टिकोण का परिचायक है। यह कदम प्रशासनिक औपचारिकता से आगे बढ़कर मानवीय संवेदना का उदाहरण बन गया है।

बीकानेर इस समय प्रचंड गर्मी की चपेट में है, जहां तापमान 43 से 44 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच चुका है। तेज धूप, लू के थपेड़े, और पराबैंगनी किरणों का बढ़ता प्रभाव विशेष रूप से बच्चों के स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा बन सकता है। ऐसे हालात में छोटे-छोटे बच्चों का स्कूल जाना, वह भी दोपहर की तपती धूप में, उनके लिए शारीरिक कष्ट और स्वास्थ्य जोखिम दोनों उत्पन्न करता है। इस पृष्ठभूमि में स्कूल समय में परिवर्तन का निर्णय न केवल व्यावहारिक है, बल्कि अत्यंत आवश्यक भी।

यह निर्णय प्रशासन की उस सोच को दर्शाता है जिसमें नागरिकों, विशेषकर बच्चों के हित को सर्वोपरि रखा गया है। अक्सर देखा जाता है कि नीतिगत फैसले आंकड़ों और नियमों के आधार पर लिए जाते हैं, लेकिन जब उनमें मानवीय संवेदना जुड़ जाती है, तो उनका प्रभाव और भी व्यापक और सकारात्मक हो जाता है। निशांत जैन का यह कदम इसी दिशा में एक सराहनीय पहल है।

जीवन के तौर-तरीकों में भी लचीलापन लाना होगा

इसके साथ ही यह निर्णय समाज के अन्य वर्गों के लिए भी एक संदेश देता है कि बदलते मौसम और बढ़ते तापमान के बीच हमें अपने जीवन के तौर-तरीकों में भी लचीलापन लाना होगा। विद्यालय प्रशासन, अभिभावकों और आमजन को भी इस प्रकार के प्रयासों का समर्थन करते हुए बच्चों की सुरक्षा और स्वास्थ्य को प्राथमिकता देनी चाहिए।

यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि प्रशासनिक जिम्मेदारी तभी सार्थक होती है जब उसमें संवेदना का समावेश हो। बीकानेर के जिला कलेक्टर का यह निर्णय न केवल वर्तमान परिस्थितियों में राहत प्रदान करता है, बल्कि यह भी दिखाता है कि सही समय पर लिया गया छोटा सा कदम भी बड़े बदलाव की दिशा में मार्ग प्रशस्त कर सकता है।

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