MAHENDRA SIINGH SHEKHAWAT बीकानेर, (समाचार सेवा)। लोकतांत्रिक व्यवस्था में पुलिस केवल कानून लागू करने वाली संस्था नहीं है, बल्कि जनता और शासन के बीच विश्वास की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी भी है। पुलिस की वर्दी का उद्देश्य नागरिकों को सुरक्षा का भरोसा देना है, न कि उन्हें भयभीत करना। ऐसे में यदि कोई पुलिस अधिकारी अपनी रैंक का हवाला देकर किसी नागरिक या सामाजिक कार्यकर्ता को डराने-धमकाने का प्रयास करता है, तो यह न केवल उसके पद की गरिमा के प्रतिकूल है बल्कि पुलिस व्यवस्था की मूल भावना के भी विपरीत है।
हाल ही में बीकानेर में एक सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ता को कथित रूप से एक पुलिस अधिकारी द्वारा रैंक की धमकी देने का मामला चर्चा में है। सामाजिक कार्यकर्ता समाज के विभिन्न मुद्दों को उठाते हैं, प्रशासन का ध्यान समस्याओं की ओर आकर्षित करते हैं और लोकतंत्र को मजबूत बनाने में अपनी भूमिका निभाते हैं। यदि किसी मुद्दे पर असहमति या विवाद की स्थिति बनती है तो उसका समाधान संवाद, धैर्य और समझाइश से किया जाना चाहिए। प्रशासनिक पद पर बैठे व्यक्ति से यही अपेक्षा भी की जाती है।
संयम और व्यवहार वास्तविक परीक्षा
प्रशासनिक सेवा और पुलिस सेवा में प्रवेश से पहले अधिकारियों को व्यापक प्रशिक्षण दिया जाता है। इस प्रशिक्षण का उद्देश्य केवल कानून की जानकारी देना नहीं होता, बल्कि लोगों के साथ संवाद स्थापित करने, तनावपूर्ण परिस्थितियों को शांतिपूर्वक संभालने और संवेदनशीलता के साथ निर्णय लेने की क्षमता विकसित करना भी होता है। किसी भी अधिकारी की वास्तविक परीक्षा उसके अधिकारों के प्रदर्शन में नहीं, बल्कि उसके संयम और व्यवहार में होती है।
रैंक व्यक्तिगत प्रभाव जमाने के लिए नहीं
रैंक का उपयोग व्यवस्था बनाए रखने के लिए किया जाना चाहिए, व्यक्तिगत प्रभाव जमाने के लिए नहीं। जब कोई अधिकारी अपनी पदवी को हथियार की तरह इस्तेमाल करता है तो उससे जनता के मन में पुलिस के प्रति सम्मान की बजाय भय और अविश्वास पैदा होता है। यह स्थिति किसी भी लोकतांत्रिक समाज के लिए शुभ संकेत नहीं मानी जा सकती। पुलिस और जनता के संबंध सहयोग और विश्वास पर आधारित होने चाहिए, न कि शक्ति प्रदर्शन और धमकी पर।
संवाद के स्थान पर रैंक का रौब चिंता का विषय
यह भी ध्यान रखने योग्य है कि सोशल मीडिया और जनसंचार के इस दौर में हर घटना तेजी से सार्वजनिक चर्चा का विषय बन जाती है। ऐसे में युवा अधिकारियों की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है कि वे अपने व्यवहार से सकारात्मक उदाहरण प्रस्तुत करें। सेवा के प्रारंभिक दौर में ही यदि संवाद के स्थान पर रैंक का रौब दिखाई देने लगे तो यह चिंता का विषय है। अधिकारों का प्रदर्शन क्षणिक प्रभाव तो छोड़ सकता है, लेकिन सम्मान केवल विनम्रता और निष्पक्षता से ही अर्जित किया जा सकता है।
ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो
पुलिस विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों को ऐसे मामलों को गंभीरता से लेते हुए तथ्यों की निष्पक्ष जांच करनी चाहिए। यदि कहीं व्यवहारगत कमी पाई जाती है तो आवश्यक परामर्श और मार्गदर्शन दिया जाना चाहिए ताकि भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो। साथ ही यह संदेश भी स्पष्ट रूप से जाना चाहिए कि वर्दी का सम्मान जनता के सम्मान से ही जुड़ा हुआ है।
पुलिस की ताकत जनता का विश्वास
अंततः पुलिस की सबसे बड़ी ताकत उसकी रैंक नहीं, बल्कि जनता का विश्वास है। जिस दिन यह विश्वास कमजोर पड़ता है, उसी दिन वर्दी की चमक भी फीकी पड़ने लगती है। इसलिए आवश्यक है कि पुलिस अधिकारी अपने अधिकारों से अधिक अपने कर्तव्यों को महत्व दें और भय नहीं, बल्कि भरोसा पैदा करने वाली कार्यशैली को अपनाएं।


