MAHENDRA SIINGH SHEKHAWAT बीकानेर, (समाचार सेवा)। पुलिस व्यवस्था किसी भी लोकतांत्रिक समाज की रीढ़ मानी जाती है। यह केवल कानून लागू करने वाली संस्था नहीं, बल्कि नागरिकों के अधिकारों और सुरक्षा की संरक्षक भी होती है। लेकिन जब यही संस्था निष्क्रियता, लापरवाही और संवेदनहीनता का पर्याय बन जाए, तो समाज में न्याय व्यवस्था पर प्रश्नचिह्न लगना स्वाभाविक है। हाल के कुछ अनुभव इस कड़वी सच्चाई को उजागर करते हैं कि पुलिस का चेहरा कई जगहों पर अपनी मूल भूमिका से भटक चुका है।
बीकानेर के एक थाने का उदाहरण सामने आता है, जहां एक स्पष्ट सड़क दुर्घटना के मामले में—गाड़ी का नंबर, सीसीटीवी फुटेज और चश्मदीद गवाह मौजूद होने के बावजूद—पांच महीनों तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई। आश्चर्यजनक रूप से, पुलिस ने अपनी ओर से आरोपी को लगभग क्लीन चिट दे दी और मामले को बंद करने की दिशा में बढ़ गई। इससे भी अधिक चिंताजनक यह है कि जांच के बुनियादी कदम—जैसे टोल प्लाजा से वाहन का रिकॉर्ड लेना या चालक की मोबाइल लोकेशन ट्रेस करना—तक नहीं उठाए गए। यह न केवल पेशेवर अक्षमता का उदाहरण है, बल्कि पीड़ित के प्रति घोर अन्याय भी है।
विकलांग व्यक्ति को देर रात थाने में बैठाए रखना अमानवीय
इसी प्रकार, राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थित एक ग्रामीण थाने का व्यवहार और भी गंभीर सवाल खड़े करता है। एक विकलांग व्यक्ति को देर रात गिरफ्तार कर अनावश्यक रूप से थाने में बैठाए रखना न केवल अमानवीय है, बल्कि कानून के दुरुपयोग का स्पष्ट संकेत भी है। यदि पुलिस किसी पक्ष विशेष के साथ मिलकर काम करती हुई दिखाई दे, तो यह न्याय के सिद्धांतों के साथ खुला विश्वासघात है। ऐसी घटनाएं यह दर्शाती हैं कि कहीं न कहीं व्यवस्था में जवाबदेही और पारदर्शिता का घोर अभाव है।
रिश्वतखोरी, पक्षपात और उदासीनता जैसी प्रवृत्तियां हावी
पुलिस के प्रति समाज में सम्मान तभी बनता है जब वह निष्पक्ष, संवेदनशील और सक्रिय भूमिका निभाए। लेकिन जब रिश्वतखोरी, पक्षपात और उदासीनता जैसी प्रवृत्तियां हावी हो जाती हैं, तो यह विश्वास धीरे-धीरे खत्म होने लगता है। “मुलजिम से बाएं हाथ से और मुस्तगिस से दाएं हाथ से लिए बिना मन नहीं मानता” जैसी धारणा यदि आम हो जाए, तो यह केवल पुलिस की छवि को ही नहीं, बल्कि पूरे न्याय तंत्र को नुकसान पहुंचाती है।
तकनीकी संसाधनों का सही उपयोग हो सुनिश्चित
समय की मांग है कि पुलिस व्यवस्था में सुधार के लिए ठोस कदम उठाए जाएं। जांच प्रक्रिया को पारदर्शी बनाया जाए, तकनीकी संसाधनों का सही उपयोग सुनिश्चित किया जाए और अधिकारियों की जवाबदेही तय हो। साथ ही, पुलिस कर्मियों को मानवीय संवेदनाओं के प्रति प्रशिक्षित करना भी उतना ही आवश्यक है, ताकि वे केवल कानून के रक्षक ही नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदार नागरिक भी बन सकें।
यदि इन खामियों को समय रहते नहीं सुधारा गया, तो पुलिस और जनता के बीच की खाई और गहरी होती जाएगी। यह स्थिति किसी भी लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं है। इसलिए जरूरी है कि पुलिस अपने आचरण और कार्यशैली में सुधार लाए, ताकि वह पुनः जनता के विश्वास की पात्र बन सके।


