MAHENDRA SIINGH SHEKHAWAT बीकानेर, (समाचार सेवा)। आधुनिक समाज में चिकित्सा सुविधाओं का विस्तार निस्संदेह एक बड़ी उपलब्धि है। बड़े-बड़े अस्पताल, अत्याधुनिक मशीनें, विशेषज्ञ चिकित्सक और नई-नई दवाइयां मानव जीवन को बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। किंतु एक चिंताजनक प्रवृत्ति यह भी देखने को मिल रही है कि हम स्वास्थ्य और चिकित्सा के बीच के मूलभूत अंतर को भूलते जा रहे हैं। समाज का पूरा ध्यान चिकित्सा पर केंद्रित हो गया है, जबकि स्वास्थ्य की उपेक्षा लगातार बढ़ रही है। परिणामस्वरूप बीमारियों का बोझ बढ़ रहा है और अस्पतालों पर निर्भरता भी।
वास्तव में चिकित्सा और स्वास्थ्य एक-दूसरे के पूरक हैं, लेकिन दोनों समान नहीं हैं। चिकित्सा का कार्य बीमारी होने के बाद उसका उपचार करना है, जबकि स्वास्थ्य का उद्देश्य बीमारी को होने ही नहीं देना है। यदि व्यक्ति अपने स्वास्थ्य के प्रति सजग रहेगा तो उसे चिकित्सा की आवश्यकता अपेक्षाकृत कम पड़ेगी। दुर्भाग्य से आज हमारी जीवनशैली ऐसी बन गई है कि हम स्वास्थ्य संबंधी सावधानियों की अनदेखी करते हैं और फिर उपचार के लिए अस्पतालों की ओर दौड़ते हैं।
बीमारियों को जन्म दे रही है अनियमित दिनचर्या
तेजी से बदलती जीवनशैली, असंतुलित खानपान, शारीरिक श्रम की कमी, बढ़ता मानसिक तनाव और अनियमित दिनचर्या अनेक बीमारियों को जन्म दे रहे हैं। मधुमेह, उच्च रक्तचाप, हृदय रोग, मोटापा और मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं पहले की तुलना में कहीं अधिक तेजी से बढ़ रही हैं। इनमें से अधिकांश बीमारियां ऐसी हैं जिन्हें उचित जीवनशैली अपनाकर काफी हद तक रोका जा सकता है। लेकिन हम स्वास्थ्य संरक्षण की बजाय चिकित्सा सुविधाओं पर अधिक भरोसा करने लगे हैं।
व्यवस्था की अपनी सीमाएं हैं
यह भी समझना होगा कि चिकित्सा व्यवस्था की अपनी सीमाएं हैं। अस्पतालों में भीड़, संसाधनों की कमी, लंबी प्रतीक्षा, बढ़ता खर्च और चिकित्सकों पर बढ़ता दबाव ऐसी समस्याएं हैं जो लगातार सामने आ रही हैं। यदि समाज का बड़ा हिस्सा बीमारियों से ग्रस्त रहेगा तो कोई भी स्वास्थ्य व्यवस्था उस बोझ को लंबे समय तक नहीं संभाल सकती। इसलिए केवल अस्पतालों की संख्या बढ़ा देना या नई मशीनें स्थापित कर देना समस्या का स्थायी समाधान नहीं है।
स्वस्थ समाज राष्ट्र की वास्तविक पूंजी
समाधान स्वास्थ्य के प्रति जन-जागरूकता बढ़ाने में निहित है। लोगों को नियमित व्यायाम, संतुलित आहार, पर्याप्त नींद, स्वच्छता और मानसिक संतुलन के महत्व को समझना होगा। विद्यालयों, महाविद्यालयों और सामाजिक संस्थाओं को स्वास्थ्य शिक्षा को प्राथमिकता देनी चाहिए। सरकारों को भी उपचार आधारित मॉडल के साथ-साथ निवारक स्वास्थ्य कार्यक्रमों पर अधिक निवेश करना चाहिए। स्वस्थ समाज ही किसी राष्ट्र की वास्तविक पूंजी होता है।
विकसित हो स्वस्थ रहने की संस्कृति
आज आवश्यकता इस बात की है कि हम बीमारी के बाद इलाज की मानसिकता से बाहर निकलकर स्वस्थ रहने की संस्कृति विकसित करें। चिकित्सा जीवन बचाने का माध्यम है, लेकिन स्वास्थ्य जीवन को बेहतर बनाने का आधार है। यदि हम स्वास्थ्य को प्राथमिकता देंगे तो चिकित्सा पर निर्भरता स्वतः कम होगी, अस्पतालों का दबाव घटेगा और समाज अधिक उत्पादक, खुशहाल तथा समृद्ध बन सकेगा। स्वास्थ्य और चिकित्सा के इस गहरे संबंध को समझना ही भविष्य की सबसे बड़ी आवश्यकता है।


