MAHENDRA SIINGH SHEKHAWAT बीकानेर, (समाचार सेवा)। लोकतंत्र में आलोचना और जवाबदेही जितनी आवश्यक है, उतना ही आवश्यक है तथ्यों को संतुलित दृष्टि से देखने का साहस। दुर्भाग्य से वर्तमान राजनीति में शुचिता, स्पष्टवादिता और नैतिक साहस का अभाव बढ़ता दिखाई देता है। यही कारण है कि किसी भी विवाद के सामने आते ही अधिकांश नेता या तो चुप्पी साध लेते हैं या फिर हवा का रुख देखकर अपनी प्रतिक्रिया तय करते हैं। परिणामस्वरूप समाज में यह संदेश जाता है कि राजनीतिक नेतृत्व सच के साथ खड़े होने के बजाय जनभावनाओं और तात्कालिक लाभ-हानि के गणित से संचालित हो रहा है।
राजस्थान के चिकित्सा मंत्री गजेंद्र सिंह खीमसर के हालिया बयान को लेकर जिस प्रकार का विवाद खड़ा हुआ, उसे भी इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए। उपलब्ध तथ्यों के आधार पर यह कहना कठिन है कि उन्होंने कोई ऐसी बात कही हो जिसे अश्लील, अभद्र या महिलाओं के प्रति अपमानजनक करार दिया जाए। उन्होंने मेडिकल कॉलेज के प्रिंसिपल से प्रश्न किया कि “क्या महिलाएं नाचती हुई आई थीं?” यह कथन निश्चित रूप से तीखा और व्यंग्यात्मक हो सकता है, लेकिन इसे उसके पूरे संदर्भ से अलग करके देखना भी उचित नहीं होगा।
कठोर या व्यंग्यपूर्ण शब्द निकल जाना असामान्य नहीं
जब किसी मंत्री के सामने लगातार एक ही विषय पर तीखे और कभी-कभी अतिरंजित प्रश्न रखे जाते हैं, तब मानवीय स्वभाव के अनुसार प्रतिक्रिया में कुछ कठोर या व्यंग्यपूर्ण शब्द निकल जाना असामान्य नहीं है। सार्वजनिक जीवन में रहने वाले लोग भी अंततः मनुष्य ही होते हैं। किसी एक वाक्य को पकड़कर पूरे व्यक्तित्व और सार्वजनिक जीवन का मूल्यांकन करना न्यायसंगत नहीं कहा जा सकता। गजेंद्र सिंह खीमसर का सार्वजनिक जीवन अपेक्षाकृत संयमित और गंभीर माना जाता है। प्रशासनिक मामलों में उनकी कार्यशैली को लेकर विभिन्न मत हो सकते हैं, लेकिन यह भी सच है कि उन्हें धैर्यवान और संजीदा नेता के रूप में जाना जाता रहा है। ऐसे में यदि किसी विशेष परिस्थिति में उनकी जुबान से कोई व्यंग्यात्मक टिप्पणी निकल गई, तो उसे उसी संदर्भ में परखा जाना चाहिए।
राजनीति केवल लोकप्रिय बात कहने का माध्यम नहीं
प्रश्न यह भी है कि यदि राजनीतिक नेतृत्व को लगता है कि मंत्री का आशय गलत नहीं था, तो फिर वह खुलकर यह बात कहने से क्यों बच रहा है? केंद्रीय मंत्री अर्जुन राम मेघवाल, कैबिनेट मंत्री सुमित गोदारा या अन्य भाजपा पदाधिकारी यदि यह मानते हैं कि कथन का अर्थ तोड़-मरोड़कर प्रस्तुत किया गया है, तो उन्हें स्पष्ट शब्दों में अपनी बात रखनी चाहिए। राजनीति केवल लोकप्रिय बात कहने का माध्यम नहीं है, बल्कि सही समझी जाने वाली बात के पक्ष में खड़े होने का साहस भी मांगती है।यह भी ध्यान रखना चाहिए कि “नाचना” अपने आप में कोई नकारात्मक या अशोभनीय शब्द नहीं है। भारतीय संस्कृति में नृत्य कला, उत्सव और अभिव्यक्ति का महत्वपूर्ण माध्यम रहा है। इसलिए किसी शब्द के प्रयोग को उसके संदर्भ और आशय से काटकर केवल विवाद का विषय बना देना स्वस्थ सार्वजनिक विमर्श की पहचान नहीं हो सकती।
चुप्पी समाधान नहीं
आज आवश्यकता इस बात की है कि राजनीति में फिर से स्पष्टवादिता और नैतिक साहस लौटे। यदि कोई बात गलत है तो उसे गलत कहने का साहस होना चाहिए और यदि कोई विवाद अनावश्यक रूप से बढ़ाया जा रहा है तो उसे भी स्वीकार करने की ईमानदारी होनी चाहिए। लोकतंत्र में चुप्पी हमेशा समाधान नहीं होती; कई बार सीना तानकर तथ्य के साथ खड़ा होना ही सबसे बड़ी राजनीतिक शुचिता होती है।


