MAHENDRA SIINGH SHEKHAWAT बीकानेर, (समाचार सेवा)। बीकानेर में इन दिनों एक दिलचस्प प्रवृत्ति देखने को मिल रही है, पुलिस से अचानक अपेक्षाओं का स्तर असामान्य रूप से बढ़ गया है। हर समस्या का समाधान मानो पुलिस के पास ही है, और हर वर्ग चाहे वह मीडिया हो या आमजन पुलिस को उसकी जिम्मेदारियों का आईना दिखाने में जुटा हुआ है।
यह जागरूकता अपने आप में सकारात्मक हो सकती है, लेकिन जब यह एकतरफा हो जाए और आत्ममंथन का अभाव हो, तो प्रश्न खड़े होना स्वाभाविक है। यह समझना जरूरी है कि पुलिस व्यवस्था समाज का ही एक अंग है, कोई अलग-थलग खड़ी संस्था नहीं। यदि समाज स्वयं अपनी जिम्मेदारियों से विमुख हो जाए और हर छोटी-बड़ी समस्या का ठीकरा पुलिस के सिर फोड़ने लगे, तो समाधान अधूरा ही रहेगा। अवैध परिवहन, अतिक्रमण, ट्रैफिक नियमों की अनदेखी, आवारा पशुओं की समस्या, अव्यवस्थित पार्किंग, अवैध खनन या टोल जैसे मुद्दे केवल पुलिस के बूते सुलझने वाले नहीं हैं। इनमें आमजन की भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
पुलिस पर दबाव बनाने की कोशिश
वर्तमान परिदृश्य में यह भी देखने को मिल रहा है कि रटे-रटाए जुमलों के माध्यम से पुलिस पर दबाव बनाने की कोशिश हो रही है, लेकिन यह कोई नहीं बताता कि समाज पुलिस के सहयोगी के रूप में क्या योगदान देगा। क्या हम ट्रैफिक नियमों का पालन स्वयं करेंगे? क्या हम अतिक्रमण से बचेंगे? क्या हम अवैध गतिविधियों की जानकारी जिम्मेदारी से साझा करेंगे? यदि इन प्रश्नों के उत्तर नकारात्मक हैं, तो केवल आलोचना से सुधार की उम्मीद करना व्यर्थ है।
जहां तक पुलिस व्यवस्था की बात है, तो यह भी सच है कि ढांचे में कोई क्रांतिकारी बदलाव नहीं हुआ है। केवल पुलिस अधीक्षक का बदल जाना पूरे सिस्टम को रातोंरात परिवर्तित नहीं कर सकता। वर्षों से स्थापित कार्यप्रणाली और मानसिकता में बदलाव एक दीर्घकालिक प्रक्रिया है, जिसके लिए निरंतर प्रयास, संसाधन और सामाजिक सहयोग आवश्यक होता है।
अपेक्षाओं के साथ-साथ जिम्मेदारियों का भी संतुलन बने
लिहाजा,आवश्यकता इस बात की है कि अपेक्षाओं के साथ-साथ जिम्मेदारियों का भी संतुलन बने। पुलिस को जवाबदेह बनाना जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी है समाज का सजग और सहयोगी बनना। जब नागरिक और पुलिस एक-दूसरे के पूरक बनकर कार्य करेंगे, तभी बीकानेर की समस्याओं का स्थायी समाधान संभव हो सकेगा।


