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राजधर्म बन गया है अवैध परिवहन का बढ़ता जाल

The expanding web of illegal transport has become the established norm.

MAHENDRA SIINGH SHEKHAWAT बीकानेर, (समाचार सेवा)। अवैध वाहनों द्वारा यात्री परिवहन का बढ़ता जाल आज केवल कानून-व्यवस्था की चुनौती नहीं, बल्कि राजधर्म की विफलता का प्रतीक बन चुका है। दिन-दहाड़े बिना परमिट सड़कों पर दौड़ती निजी बसें जिस बेखौफ अंदाज में यात्रियों को ढो रही हैं, वह शासन और प्रशासन की निष्क्रियता पर गंभीर सवाल खड़े करता है। गति की अंधी दौड़ में ये वाहन भले ही दूरी कम कर रहे हों, लेकिन हर दिन हजारों यात्रियों की जान जोखिम में डाल रहे हैं।

सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि इन वाहनों की वैधता और सुरक्षा से जुड़े बुनियादी सवालों के जवाब तक उपलब्ध नहीं हैं। चालक प्रशिक्षित हैं या नहीं, कंडक्टर अधिकृत हैं या नहीं, वाहन फिटनेस प्रमाणित है या नहीं—इन सभी प्रश्नों पर गहरा अंधकार है। ऐसे में किसी दुर्घटना की स्थिति में जवाबदेही तय करना भी मुश्किल हो जाता है। यह न केवल यातायात नियमों का खुला उल्लंघन है, बल्कि मानव जीवन के प्रति घोर लापरवाही भी है।

राज्य परिवहन सेवाओं के राजस्व को सीधे नुकसान

दूसरी ओर, ये अवैध वाहन राज्य परिवहन सेवाओं के राजस्व को सीधे नुकसान पहुंचा रहे हैं। जो आय सरकार को मिलनी चाहिए, वह अवैध रूप से निजी हाथों में जा रही है। न तो ये वाहन जीएसटी का भुगतान करते हैं और न ही आयकर का, जिससे राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था को भी हानि पहुंचती है। प्रतिदिन लाखों रुपये की यह काली कमाई एक समानांतर और गैरकानूनी तंत्र को जन्म दे रही है।

सबसे गंभीर आरोप परिवहन विभाग की भूमिका पर लगता है। यदि ये वाहन खुलेआम संचालित हो रहे हैं, तो यह मानना कठिन नहीं कि कहीं न कहीं अघोषित लेनदेन और मिलीभगत का खेल चल रहा है। कानून का पालन करवाने वाली एजेंसियां यदि मौन रहें या आंखें मूंद लें, तो यह स्थिति और भी भयावह हो जाती है।

सरकार इस मुद्दे को प्राथमिकता से लें

सरकार और प्रशासन इस मुद्दे को प्राथमिकता से लें। सख्त जांच, नियमित कार्रवाई और जवाबदेही तय करना अनिवार्य है। साथ ही, आम जनता को भी जागरूक होना होगा कि वे अपनी सुरक्षा के साथ समझौता न करें। यदि राजधर्म का वास्तविक पालन करना है, तो कानून का राज स्थापित करना ही होगा—वरना ये अवैध वाहन न केवल सड़कों पर, बल्कि व्यवस्था पर भी हावी होते रहेंगे।

 

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