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शिक्षा और शिक्षक को संवेदनशीलता से देखना होगा

Education and teachers must be viewed with sensitivity.

MAHENDRA SIINGH SHEKHAWAT बीकानेर, (समाचार सेवा)।   भीषण गर्मी के इस दौर में जब आमजन का जीवन तक प्रभावित हो रहा है, ऐसे में शिक्षा व्यवस्था से जुड़ी अपेक्षाओं और निर्णयों को भी संवेदनशील दृष्टि से देखने की आवश्यकता है। हाल ही में स्कूलों के समय में कटौती करना प्रशासन का एक सराहनीय कदम रहा, जो यह दर्शाता है कि बच्चों और शिक्षकों के स्वास्थ्य को प्राथमिकता दी जा रही है। लेकिन इसी के साथ शिक्षकों पर बढ़ता दबाव, विशेषकर ड्रॉप आउट रोकने और नव प्रवेश बढ़ाने जैसे लक्ष्यों को लेकर, एक गंभीर प्रश्न खड़ा करता है।

यह समझना आवश्यक है कि शिक्षक केवल शैक्षणिक कार्यों तक सीमित नहीं हैं। उन्हें समय-समय पर चुनाव, जनगणना और अन्य प्रशासनिक कार्यों में भी लगाया जाता है। जब जिला प्रशासन स्वयं शिक्षकों को इन कार्यों के लिए बुलाता है, तो उनके सामने एक द्वंद्व की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। एक ओर प्रशासनिक आदेशों की अनदेखी करना उनके लिए संभव नहीं होता, तो दूसरी ओर शिक्षा विभाग उनसे शत-प्रतिशत उपस्थिति और परिणामों की अपेक्षा करता है। ऐसे में शिक्षकों को दोषी ठहराना वस्तुतः व्यवस्था की खामियों को नजरअंदाज करना है।

हाल ही में निरीक्षण के दौरान शिक्षा विभाग की स्थिति भी चिंताजनक सामने आई, जहां बड़ी संख्या में अनुपस्थिति दर्ज की गई,निदेशालय में 67 प्रतिशत अनुपस्थिति  यह दर्शाती है कि उनको पासिंग मार्क्स भी नहीं मिले? इसलिए केवल शिक्षकों की लापरवाही का परिणाम मान लेना उचित नहीं होगा, बल्कि इसके पीछे की परिस्थितियों और दबावों को भी समझना होगा। यदि एक ही व्यक्ति से कई जिम्मेदारियां एक साथ निभाने की अपेक्षा की जाएगी, तो परिणाम प्रभावित होना स्वाभाविक है।

अनुशासन आवश्यक है, लेकिन उसका स्वरूप हो सुधारात्मक 

शिक्षकों पर निलंबन जैसी कठोर कार्रवाई करना न केवल उनके मनोबल को तोड़ता है, बल्कि इस पेशे की गरिमा को भी ठेस पहुंचाता है। शिक्षक समाज का वह स्तंभ है, जो आने वाली पीढ़ियों को दिशा देता है। यदि उसी के आत्मसम्मान को ठेस पहुंचेगी, तो इसका प्रभाव शिक्षा की गुणवत्ता पर भी पड़ेगा। अनुशासन आवश्यक है, लेकिन उसका स्वरूप दंडात्मक के बजाय सुधारात्मक होना चाहिए।

कायम रहता है शिक्षकों का विश्वास  

शिक्षा विभाग के उच्च अधिकारियों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे इस परिस्थिति को संवेदनशीलता से समझें। चेतावनी, संवाद और मार्गदर्शन जैसे उपाय अधिक प्रभावी हो सकते हैं, बजाय सीधे कठोर दंड देने के। इससे न केवल व्यवस्था बनी रहती है, बल्कि शिक्षकों का विश्वास भी कायम रहता है।

लिहाजा यह जरूरी है कि शिक्षा व्यवस्था में संतुलन स्थापित किया जाए—जहां प्रशासनिक आवश्यकताओं और शैक्षणिक जिम्मेदारियों के बीच तालमेल हो। शिक्षकों की मेहनत और निष्ठा को पहचानते हुए उनके आत्मसम्मान की रक्षा करना ही एक सशक्त और संवेदनशील शिक्षा प्रणाली की पहचान होगी।

 

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