MAHENDRA SIINGH SHEKHAWAT बीकानेर, (समाचार सेवा)। भारतीय समाज की संरचना में सामाजिक असमानता और जातिगत भेदभाव की जड़ें बहुत गहरी रही हैं। इन्हीं ऐतिहासिक अन्यायों को ध्यान में रखते हुए अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के संरक्षण के लिए कठोर कानूनी प्रावधान किए गए, ताकि पीड़ित वर्ग को न्याय मिल सके और उनके साथ होने वाले अत्याचारों पर अंकुश लगाया जा सके। लेकिन हाल के वर्षों में यह चिंता उभर कर सामने आई है कि एट्रोसिटी (अत्याचार) के अनेक मामलों में जांच एजेंसियां अंतिम रिपोर्ट लगाकर उन्हें झूठा या निराधार मान लेती हैं। यह प्रवृत्ति न केवल संवेदनशीलता के अभाव को दर्शाती है, बल्कि कानून के उद्देश्य पर भी प्रश्नचिह्न खड़ा करती है।
यह समझना आवश्यक है कि एट्रोसिटी के मामले सामान्य आपराधिक मामलों से भिन्न होते हैं। ऐसे मामलों में शिकायत दर्ज कराने का निर्णय अक्सर पीड़ित के लिए अत्यंत कठिन और जोखिमपूर्ण होता है। सामाजिक दबाव, प्रताड़ना का भय, और न्यायिक प्रक्रिया की जटिलता—ये सभी कारक किसी भी व्यक्ति को शिकायत दर्ज कराने से पहले कई बार सोचने पर मजबूर करते हैं। ऐसे में जब कोई पीड़ित व्यक्ति साहस जुटाकर मामला दर्ज कराता है, तो उसे संदेह की दृष्टि से देखना या बिना पर्याप्त जांच के अंतिम रिपोर्ट लगा देना न्याय की भावना के विपरीत है।
संभव है किसी भी कानून का दुरुपयोग
निस्संदेह, यह भी सच है कि किसी भी कानून का दुरुपयोग संभव है और एट्रोसिटी कानून भी इससे अछूता नहीं है। कुछ मामलों में झूठी शिकायतें भी सामने आई हैं, जिनसे निर्दोष व्यक्तियों को परेशान होना पड़ा है। लेकिन इस आधार पर हर मामले को संदेह की नजर से देखना एक खतरनाक प्रवृत्ति है। इससे वास्तविक पीड़ितों का मनोबल टूटता है और वे न्याय प्रणाली पर से विश्वास खोने लगते हैं।
हो निष्पक्ष, गहन और संवेदनशील जांच
जांच एजेंसियों और पुलिस प्रशासन की जिम्मेदारी है कि वे हर मामले की निष्पक्ष, गहन और संवेदनशील जांच करें। पूर्वाग्रह या सामाजिक मानसिकता के प्रभाव में आकर निर्णय लेना न्याय के सिद्धांतों के साथ अन्याय है। यदि किसी मामले में साक्ष्य पर्याप्त नहीं हैं, तो भी यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि जांच पूरी ईमानदारी और पारदर्शिता के साथ की गई हो। केवल औपचारिकता निभाने के लिए अंतिम रिपोर्ट लगाना न तो कानून के अनुरूप है और न ही नैतिक दृष्टि से उचित।
लोगों को झूठे मामलों से बचाना आवश्यक
इसके साथ ही, न्यायिक व्यवस्था को भी संतुलन बनाए रखना होगा। जहां एक ओर निर्दोष लोगों को झूठे मामलों से बचाना आवश्यक है, वहीं दूसरी ओर वास्तविक पीड़ितों को न्याय दिलाना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। इसके लिए प्रशिक्षण, संवेदनशीलता और जवाबदेही की आवश्यकता है। पुलिस और न्यायिक अधिकारियों को इस विषय में विशेष प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए, ताकि वे सामाजिक संदर्भों को समझते हुए निर्णय ले सकें।
कानून के क्रियान्वयन में लापरवाही या पूर्वाग्रह
एट्रोसिटी कानून केवल एक कानूनी प्रावधान नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय का एक सशक्त माध्यम है। इसका उद्देश्य कमजोर और वंचित वर्गों को सुरक्षा प्रदान करना है। यदि इस कानून के क्रियान्वयन में लापरवाही या पूर्वाग्रह हावी होता है, तो यह न केवल कानून की आत्मा के साथ अन्याय है, बल्कि समाज में असमानता को और गहरा करता है। इसलिए आवश्यक है कि हर मामले को गंभीरता, निष्पक्षता और संवेदनशीलता के साथ लिया जाए, ताकि न्याय केवल एक शब्द न रहकर एक वास्तविकता बन सके।


