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पक्षपातपूर्ण और पूर्वग्रह से युक्त अनुसंधान,पुलिस की नाफरमानी और प्राकृतिक न्याय के खिलाफ

MAHENDRA SIINGH SHEKHAWAT बीकानेर, (समाचार सेवा)।   भारतीय न्याय व्यवस्था का मूल उद्देश्य निष्पक्षता, पारदर्शिता और त्वरित न्याय सुनिश्चित करना है, लेकिन व्यवहारिक स्तर पर पुलिस अनुसंधान की प्रक्रिया कई बार इन आदर्शों से भटकती हुई दिखाई देती है। विशेष रूप से भारतीय न्याय संहिता की धाराओं के अंतर्गत होने वाले अनुसंधानों में यह देखा गया है कि कुछ मामलों में पुलिस अधिकारी अनजाने या कभी-कभी जानबूझकर पूर्वाग्रह पाल लेते हैं, जिससे जांच की निष्पक्षता प्रभावित होती है।

निस्संदेह, पुलिस तंत्र में अनेक अधिकारी ऐसे हैं जो अपनी ईमानदारी, दक्षता और कर्तव्यनिष्ठा के बल पर सच्चाई को सामने लाने का सराहनीय प्रयास करते हैं। वे साक्ष्यों और तथ्यों के आधार पर जांच को आगे बढ़ाते हैं और न्याय की प्रक्रिया को मजबूत बनाते हैं। लेकिन दूसरी ओर, यह भी कटु सत्य है कि कई मामलों में अनुसंधान प्रभावित, पक्षपातपूर्ण या अधूरा रह जाता है। इसका परिणाम यह होता है कि न्याय में अनावश्यक विलंब होता है और अदालतों को भी जांच की गुणवत्ता पर टिप्पणी करने के लिए बाध्य होना पड़ता है।

दबाव में बदल दी जाती है अनुसंधान की दिशा

सबसे चिंताजनक प्रवृत्ति यह है कि कुछ मामलों में मुलजिम के प्रभाव या दबाव में आकर अनुसंधान की दिशा बदल दी जाती है। यह न केवल कानून के शासन के लिए खतरा है, बल्कि समाज के विश्वास को भी कमजोर करता है। यदि जांच एजेंसी ही निष्पक्ष न रहे, तो पीड़ित को न्याय मिलने की संभावना स्वतः कम हो जाती है। न्याय व्यवस्था का पूरा ढांचा इस सिद्धांत पर आधारित है कि हर व्यक्ति को निष्पक्ष सुनवाई का अधिकार है, और जांच उसी का पहला और सबसे महत्वपूर्ण चरण है।

पीड़ित को संदेह की दृष्टि से देखना और अपराधी के प्रति सहानुभूति रखना प्राकृतिक न्याय का मूल आधार यह है कि दोषी को मिले सजा

न्याय के सिद्धांतों के विपरीत है। न्याय का मूल आधार यह है कि दोषी को सजा मिले और निर्दोष को संरक्षण। लेकिन जब जांच की प्रक्रिया ही पक्षपातपूर्ण हो जाती है, तो यह संतुलन बिगड़ जाता है। इससे न केवल पीड़ित का मनोबल टूटता है, बल्कि समाज में यह संदेश भी जाता है कि न्याय पाना आसान नहीं है।

अनुसंधान प्रक्रिया हो अधिक जवाबदेह और पारदर्शी  

इस स्थिति को सुधारने के लिए आवश्यक है कि पुलिस अनुसंधान की प्रक्रिया को अधिक जवाबदेह और पारदर्शी बनाया जाए। आधुनिक तकनीकों का उपयोग, स्वतंत्र निगरानी तंत्र और अधिकारियों का नियमित प्रशिक्षण इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकते हैं। साथ ही, जांच अधिकारियों में नैतिक मूल्यों और संवेदनशीलता को बढ़ावा देना भी उतना ही जरूरी है।

जांच की पहली कड़ी से ही शुरू होता है न्याय

न्याय केवल अदालतों में नहीं, बल्कि जांच की पहली कड़ी से ही शुरू होता है। यदि अनुसंधान निष्पक्ष, सटीक और प्रभावी होगा, तो न्यायिक प्रक्रिया स्वतः मजबूत होगी। इसलिए यह समय की मांग है कि पुलिस अनुसंधान को पूर्वाग्रहों से मुक्त कर उसे पूर्णतः न्यायसंगत बनाया जाए, ताकि आम नागरिक का विश्वास न्याय व्यवस्था में बना रहे।

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