MAHENDRA SIINGH SHEKHAWAT बीकानेर, (समाचार सेवा)। कहा जाता है कि लम्हों की खता से सदियों को सजा भुगतनी पड़ती है। यह कथन बीकानेर जैसे विशाल संभावनाओं वाले क्षेत्र पर पूरी तरह लागू होता है। प्राकृतिक संसाधनों, भौगोलिक स्थिति और उद्यमशील समाज के बावजूद बीकानेर आज भी उस औद्योगिक और आर्थिक पहचान से वंचित है, जिसका वह वास्तविक हकदार था। यह विडंबना ही है कि जिन संसाधनों ने दूसरे क्षेत्रों की तकदीर बदल दी, वे बीकानेर के लिए अपेक्षित विकास का आधार नहीं बन सके।
बीकानेर देश के सबसे बड़े जिप्सम उत्पादक क्षेत्रों में गिना जाता है। जिप्सम सीमेंट, प्लास्टर और निर्माण उद्योग का महत्वपूर्ण कच्चा माल है। लेकिन इस संसाधन पर आधारित बड़े उद्योगों का विकास यहां नहीं हो सका। दूसरी ओर गुजरात का मोरबी आज सिरेमिक और टाइल उद्योग का राष्ट्रीय केंद्र बन चुका है। वहां कच्चे माल और उद्योगों के समन्वय ने लाखों लोगों को रोजगार दिया तथा पूरे क्षेत्र की आर्थिक तस्वीर बदल दी। प्रश्न यह है कि जिस क्षेत्र की धरती जिप्सम से समृद्ध है, वहां ऐसी औद्योगिक क्रांति क्यों नहीं हो सकी?
उद्योग की बड़ी इकाइयां यहां स्थापित नहीं हो सकीं
इसी प्रकार बीकानेर की ऊन दशकों से अपनी गुणवत्ता के लिए प्रसिद्ध रही है। यहां के पशुपालकों और ऊन उत्पादकों का योगदान देशभर में माना जाता है। लेकिन ऊन के प्रसंस्करण, कालीन निर्माण और वस्त्र उद्योग की बड़ी इकाइयां यहां स्थापित नहीं हो सकीं। उत्तर प्रदेश का भदोही आज विश्वस्तर पर कालीन उद्योग के लिए पहचान रखता है। वहां रोजगार, निर्यात और आर्थिक गतिविधियों का विशाल तंत्र विकसित हुआ। यदि समय रहते दूरदर्शी योजनाएं बनाई जातीं, तो बीकानेर भी ऊन आधारित उद्योगों का राष्ट्रीय केंद्र बन सकता था।
लाभ का बड़ा हिस्सा अन्य क्षेत्रों तक पहुंचा
नमकीन उद्योग का उदाहरण भी कम रोचक नहीं है। बीकानेरी भुजिया और नमकीन ने पूरे देश में अपनी अलग पहचान बनाई है। अनेक बड़े ब्रांडों ने इसी परंपरा को आधार बनाकर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में सफलता प्राप्त की। लेकिन इस उद्योग के विस्तार से जुड़े बड़े निवेश, खाद्य प्रसंस्करण पार्क, अनुसंधान केंद्र और निर्यात सुविधाएं बीकानेर में अपेक्षित स्तर पर विकसित नहीं हो सकीं। परिणामस्वरूप उत्पाद की पहचान तो बीकानेर के नाम से बनी, लेकिन उससे उत्पन्न आर्थिक लाभ का बड़ा हिस्सा अन्य क्षेत्रों तक पहुंच गया।
राजनीतिक इच्छाशक्ति का अभाव
यह स्थिति केवल संसाधनों की कमी का परिणाम नहीं है, बल्कि दीर्घकालिक दृष्टि और राजनीतिक इच्छाशक्ति के अभाव का भी दुष्परिणाम है। दशकों तक सत्ता और प्रभाव के केंद्रों में बैठे लोगों से अपेक्षा थी कि वे बीकानेर की प्राकृतिक और पारंपरिक ताकतों को आधुनिक उद्योगों से जोड़ते। रोजगार, निवेश और आधारभूत संरचना के माध्यम से क्षेत्र को नई दिशा देते। दुर्भाग्य से ऐसी योजनाएं या तो बनी नहीं, या फिर प्रभावी रूप से लागू नहीं हो सकीं।
राजनीति और नेतृत्व की सबसे बड़ी कसौटी
आज भी समय पूरी तरह हाथ से नहीं निकला है। आवश्यकता इस बात की है कि बीकानेर को केवल संसाधन उत्पादक क्षेत्र नहीं, बल्कि मूल्य संवर्धन और उद्योग आधारित अर्थव्यवस्था के रूप में विकसित किया जाए। इतिहास यह अवश्य दर्ज करता है कि अवसर मिलने पर किसने विकास का मार्ग प्रशस्त किया और किसने उसे गंवा दिया। आने वाली पीढ़ियां भी यही प्रश्न पूछेंगी कि इतनी संभावनाओं के बावजूद बीकानेर अपनी पूरी क्षमता तक क्यों नहीं पहुंच पाया। यही प्रश्न भविष्य की राजनीति और नेतृत्व की सबसे बड़ी कसौटी भी बनेगा।


