MAHENDRA SIINGH SHEKHAWAT बीकानेर, (समाचार सेवा)। देश की सबसे महत्वपूर्ण प्रतियोगी परीक्षाओं में शामिल नीट परीक्षा में पेपर लीक जैसे गंभीर मामलों का सामने आना केवल परीक्षा प्रणाली पर सवाल नहीं उठाता, बल्कि यह देश के लाखों मेहनती विद्यार्थियों के भविष्य के साथ खिलवाड़ भी है। हाल ही में महाराष्ट्र से इस मामले में कुछ आरोपियों की गिरफ्तारी ने यह स्पष्ट कर दिया है कि पेपर लीक का नेटवर्क केवल एक राज्य तक सीमित नहीं, बल्कि कई राज्यों में फैले संगठित गिरोहों के माध्यम से संचालित हो रहा है। ऐसे में राजस्थान के सीकर जैसे कोचिंग हब की भूमिका पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
सीकर पिछले कुछ वर्षों में मेडिकल और इंजीनियरिंग प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी का बड़ा केंद्र बनकर उभरा है। हजारों विद्यार्थी यहां कोचिंग लेने आते हैं। लेकिन इसके साथ ही यह भी देखने में आया है कि प्रतियोगी परीक्षाओं के आसपास सक्रिय दलालों और संदिग्ध एजेंटों का नेटवर्क भी तेजी से बढ़ा है। कई बार अभिभावकों और विद्यार्थियों के बीच यह चर्चा होती रही है कि कुछ लोग मोटी रकम लेकर चयन सुनिश्चित करने के दावे करते हैं। यदि ऐसी गतिविधियां लंबे समय से चल रही हैं तो यह केवल व्यक्तिगत अपराध नहीं बल्कि संस्थागत लापरवाही का विषय भी है।
संदिग्ध नेटवर्क की हो गंभीरता से जांच
सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि आखिर जांच एजेंसियां अब तक सीकर के कोचिंग नेटवर्क की गहराई से पड़ताल क्यों नहीं कर पाई हैं। राजस्थान पुलिस की एसओजी ने पूर्व में कई पेपर लीक मामलों का खुलासा किया है और उसकी कार्यप्रणाली की सराहना भी हुई है, लेकिन नीट जैसे राष्ट्रीय स्तर के मामले में यदि सीकर के संदिग्ध नेटवर्क की गंभीरता से जांच नहीं होती तो यह कई आशंकाओं को जन्म देता है। जरूरत इस बात की है कि केवल छोटे दलालों या माध्यमों तक सीमित रहने के बजाय पूरे नेटवर्क की तह तक जाया जाए।
मन में संदेह पैदा कर रही है सरकारी चुप्पी
राज्य सरकार की चुप्पी भी लोगों के मन में संदेह पैदा कर रही है। जब देशभर में पेपर लीक के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग उठ रही है, तब राजस्थान सरकार को पारदर्शिता के साथ यह बताना चाहिए कि इस मामले में अब तक क्या जांच हुई और आगे क्या कदम उठाए जा रहे हैं। यदि किसी भी कोचिंग संस्थान, एजेंट या प्रभावशाली व्यक्ति की भूमिका सामने आती है तो उसके खिलाफ निष्पक्ष कार्रवाई होनी चाहिए। शिक्षा के क्षेत्र में राजनीतिक या आर्थिक प्रभाव के आधार पर संरक्षण देना समाज और युवाओं दोनों के साथ अन्याय होगा।
समय केवल बयानबाजी का नहीं
प्रतियोगी परीक्षाओं की विश्वसनीयता किसी भी राष्ट्र की प्रतिभा व्यवस्था की नींव होती है। यदि मेहनत करने वाला विद्यार्थी यह महसूस करने लगे कि सफलता पैसे और पहुंच के आधार पर तय हो रही है, तो यह व्यवस्था के प्र


