MAHENDRA SIINGH SHEKHAWAT बीकानेर, (समाचार सेवा)। हिंदी पत्रकारिता के पितामह भारतेंदु हरिश्चन्द्र ने बहुत पहले ही यह स्पष्ट कर दिया था कि किसी भी विषय की चर्चा यदि केवल चर्चा के लिए या प्रसिद्धि पाने के लिए की जाए, तो वह पत्रकारिता नहीं, बल्कि सामाजिक प्रदूषण है। यह विचार आज के दौर में पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हो उठा है, जब सूचना का प्रवाह तीव्र है, लेकिन उसकी विश्वसनीयता और उद्देश्य पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े हो रहे हैं।
वर्तमान समय में पत्रकारिता का एक बड़ा हिस्सा ‘दिखने’ और ‘ट्रेंड’ करने की होड़ में उलझता जा रहा है। समाचारों की प्राथमिकता अब जनहित से हटकर सनसनी, विवाद और तात्कालिक लोकप्रियता पर केंद्रित होती दिख रही है। सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स ने अभिव्यक्ति को लोकतांत्रिक तो बनाया है, लेकिन इसके साथ ही बिना तथ्य-जांच के सामग्री परोसने की प्रवृत्ति भी तेजी से बढ़ी है। इसका परिणाम यह है कि आमजन के बीच भ्रम, अविश्वास और सामाजिक विभाजन की स्थितियाँ निर्मित हो रही हैं।
सत्ता से सवाल और सत्य सामने लाना
पत्रकारिता का मूल उद्देश्य समाज को जागरूक करना, सत्ता से सवाल करना और सत्य को सामने लाना रहा है। लेकिन जब यह उद्देश्य पीछे छूट जाता है और उसकी जगह व्यक्तिगत प्रचार, टीआरपी या क्लिक की लालसा ले लेती है, तब यह पेशा अपनी गरिमा खोने लगता है। शब्दों की मर्यादा, विषय की गंभीरता और प्रस्तुति की जिम्मेदारी—ये सभी तत्व धीरे-धीरे क्षीण होते जा रहे हैं। ऐसे में पत्रकारिता न केवल अपनी विश्वसनीयता खोती है, बल्कि समाज में सांस्कृतिक अपमिश्रण और नैतिक अवमूल्यन को भी बढ़ावा देती है।
पेशे की मूल आत्मा को समझें
आज आवश्यकता इस बात की है कि जो लोग स्वयं को पत्रकार कहते हैं, वे इस पेशे की मूल आत्मा को समझें और उसे पुनः स्थापित करने का प्रयास करें। पत्रकारिता केवल सूचना देने का माध्यम नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना को दिशा देने वाला सशक्त उपकरण है। इसलिए हर खबर, हर शब्द और हर प्रस्तुति के पीछे एक जिम्मेदारी निहित होती है।
पत्रकारिता की सबसे बड़ी पूंजी है विश्वास
समाज का विश्वास पत्रकारिता की सबसे बड़ी पूंजी है। यदि यह विश्वास टूटता है, तो केवल मीडिया ही नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक ढांचा भी कमजोर होता है। अतः पत्रकारों को चाहिए कि वे तथ्यों की जांच-परख को प्राथमिकता दें, सनसनी से दूर रहें और जनहित को सर्वोपरि रखें। साथ ही, दर्शकों और पाठकों को भी सजग रहना होगा, ताकि वे सत्य और असत्य के बीच अंतर कर सकें।
सत्य और संवेदनशीलता हो पहचान
यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि पत्रकारिता का भविष्य उसकी जिम्मेदारी और नैतिकता पर निर्भर करता है। यदि इसे केवल लोकप्रियता का साधन बना दिया गया, तो यह समाज के लिए मार्गदर्शक नहीं, बल्कि भटकाने वाला माध्यम बन जाएगी। समय की मांग है कि पत्रकारिता फिर से अपने मूल्यों की ओर लौटे जहां शोर नहीं, बल्कि सत्य और संवेदनशीलता उसकी पहचान हो।


