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जंगलों का यथावत रहना ही है वास्तविक विकास-प्रो. मनोज दीक्षित

The preservation of forests in their pristine state constitutes true development — Prof. Manoj Dixit. 890

बीकानेर, (समाचार सेवा)। महाराजा गंगा सिंह विश्वविद्यालय (एमजीएसयू) बीकानेर के कुलगुरु आचार्य मनोज दीक्षित ने कहा कि जंगलों का यथावत रहना ही वास्तविक विकास कहा जा सकता है। प्रो. दीक्षित शुक्रवार को अंतरराष्ट्रीय जैव विविधता दिवस के अवसर पर महाराजा गंगा सिंह विश्वविद्यालय बीकानेर तथा राजस्थान राज्य जैव विविधता मंडल की ओर से आयोजित जैव विविधता जागरूकता कार्यक्रम को कार्यक्रम अध्‍यक्ष के रूप में संबोधित कर रहे थे।

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उन्‍होंने जैव विविधता के संरक्षण के लिये सामूहिक साझेदारी की बात रखी। उन्होंने ग्रामीणों से कहा कि चूहे, टिड्डी, तितली और कीट पंतगों के साथ-साथ रेगीस्तानी पशु और वृक्षों की महत्वतता को समझाते हुए उन्हे रेगीस्तान की पहचान बताया। प्रो. दीक्षित ने जैव विधिधता के साथ मानवीय गतिविधियों के नकारात्मक रूप की निन्दा की। कुलुगरु ने कहा कि विश्वविद्यालय परिसर में भी जैव विविधता पार्क बनाया गया है जिसमें परिसर में रहने वाले वन्य जीवों के लिए जल की उपलब्धता सुनिश्चित की गई है। जागरूकता कार्यक्रम में विश्वविद्यालय के आप-पास के गांव नाल बडी, नोखा दहिया, नापासर, किल्चू, कल्याणसर, उदासर, कोटडी, स्वरूपदेसर आदि गांवों के लोग भी शामिल हुए। राजस्थानी के अतिथि शिक्षक रामवतार उपाध्याय ने जैव विविधता विषय पर कविता वाचन राजस्थानी भाषा में किया।

थार मरूस्थल की जैव विविधता पर प्रजेटेंशन प्रस्तुत किया

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आयोजन सचिव डॉ. लीला कौर ने वैश्विक प्रभाव के लिए स्थानीय स्तर पर कार्य का परिचय देते हुए उसके महत्व पर प्रकाश डाला। विभागाध्यक्ष पर्यावरण  प्रो. अनिल कुमार छंगाणी ने कुलगुरु आचार्य मनोज दीक्षित, वित्त नियंत्रक देवेन्द्र सिंह राठौड एवं शुष्क बागवानी केन्द्र के विभागाध्यक्ष प्रोफेसर धूरेन्द्र सिंह का स्वागत किया। उन्‍होंने विद्यार्थियों एवं उपस्थित ग्रामीणों को थार मरूस्थल की जैव विविधता एवं इसके संरक्षण विषय पर प्रजेटेंशन प्रस्तुत किया। प्रस्तुतीकरण में प्रो. छंगाणी ने जलवायु परिवर्तन, रेगीस्तानी संकटग्रस्त पशु व पादपों के साथ जल संरक्षण की तकनीकों व खेती के बदलते हुए पहलुओं पर गा्रमीणों के साथ अपने विचार एवं अनुभव साझा करते हुए उन्हें प्रेरणा दी। शुष्क बागवानी केन्द्र के विभागाध्यक्ष प्रो. धूरेन्द्र सिंह ने विद्यार्थियों एवं ग्रामीणों को जलवायु व फसलों की विविधता के बारे में समझाया।

पेटेंट, बॉयोडाइवर्सिटी रजिस्टर तथा बॉयोपाइरेसी की दी जानकारी

उन्होंने फसल उत्पादन हेतु विविध तकनीकों की महत्वतता एवं प्रभाव के बारे में विद्यार्थियों एवं ग्रामीणों का जानकारी दी। जिला वन अधिकारी संदीप कुमार छलाणी एवं सहायक वन संरक्षक डॉ. पूजा पंचारिया द्वारा पेटेंट, बॉयोडाइवर्सिटी रजिस्टर तथा बॉयोपाइरेसी आदि मुख्य बिन्दुओं से ग्रामीणों एवं विद्यार्थियों को अवगत कराया। समापन समारोह में विश्वविद्यालय प्रोफेसर राजाराम चोयल ने भी विचार रखे।

इनका रहा सहयोग

आयोजन में शोधार्थी प्रियंका जांगिड, प्रमिला सोलंकी, जयकिशन छंगाणी, ज्योति जोशी, प्रियव्रत पाण्डे, रोहित, श्वेता, मानसी अनिल पूनिया और सुनील पूनियां ने सहयोग किया। कार्यक्रम में विश्वविद्यालय के शिक्षक डॉ. सीमा शर्मा, डॉ. प्रगति सोबती, डॉ. संतोष कंवर शेखावत, डॉ. गौतम मेघवंशी, डॉ. धर्मेश हरवानी, डॉ. अभिषेक वशिष्ठ, अमरेश कुमार सिंह उप कुलसचिव डॉ. प्रकाश सारण, सहायक कुलसचिव डॉ. सुरेन्द्र गोदारा एवं श्रीकृष्ण जाट, सुभाष उपस्थित रहे।

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