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मंत्रियों,जन प्रतिनिधियों की उदासीनता और शिथिलता का शिकार बीकानेर

MAHENDRA SIINGH SHEKHAWAT बीकानेर, (समाचार सेवा)।  राजस्थान के उत्तर-पश्चिमी छोर पर स्थित बीकानेर, ऐतिहासिक विरासत और सांस्कृतिक समृद्धि के लिए जाना जाता है, लेकिन विकास की दौड़ में यह शहर लंबे समय से पिछड़ता हुआ दिखाई देता है। आज़ादी के बाद जहां जयपुर, जोधपुर और उदयपुर जैसे शहरों ने तेज़ी से प्रगति की, वहीं बीकानेर अपेक्षित गति हासिल नहीं कर पाया। इस स्थिति को केवल संसाधनों की कमी नहीं, बल्कि स्पष्ट रूप से राजनीतिक शिथिलता का परिणाम माना जाना चाहिए।

बीकानेर ने समय-समय पर ऐसे जनप्रतिनिधि दिए, जिन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर महत्वपूर्ण पदों को सुशोभित किया। बलराम जाखड़ जैसे वरिष्ठ नेता और अन्य सांसद केंद्र सरकार में प्रभावशाली भूमिका निभाते रहे, लेकिन विडंबना यह है कि उनके कार्यकाल में बीकानेर को वह प्राथमिकता नहीं मिल सकी, जिसकी उसे आवश्यकता थी। स्थानीय विकास के प्रति यह उदासीनता अब एक दीर्घकालिक समस्या का रूप ले चुकी है।

शहर की बुनियादी समस्याएं आज भी जस की तस हैं। रेलवे फाटकों की समस्या दशकों से लोगों की दैनिक दिनचर्या को प्रभावित कर रही है। उच्च शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी बीकानेर लगातार उपेक्षित रहा है,न यहां केंद्रीय विश्वविद्यालय स्थापित हुआ और न ही अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान जैसी महत्वपूर्ण स्वास्थ्य संस्था का लाभ मिला। वेटेरिनरी विश्वविद्यालय का जोबनेर स्थानांतरण और सीएडी जैसी परियोजनाओं की विफलता इस उपेक्षा के ठोस उदाहरण हैं।

राजनीतिक जवाबदेही की मांग का अभाव

सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि जनता भी इस स्थिति को मानो अपनी नियति मान चुकी है। राजनीतिक जवाबदेही की मांग का अभाव और नेतृत्व के प्रति अत्यधिक सहनशीलता ने इस शिथिलता को और गहरा किया है। यदि यही स्थिति बनी रही, तो बीकानेर विकास की मुख्यधारा से और दूर होता जाएगा।

अब समय आ गया है कि बीकानेर की जनता और नेतृत्व दोनों आत्ममंथन करें। जनप्रतिनिधियों को अपने दायित्व का बोध कराते हुए ठोस योजनाओं और प्रभावी क्रियान्वयन की दिशा में कदम बढ़ाने होंगे। बीकानेर की संभावनाएं अपार हैं, आवश्यकता केवल उन्हें पहचानने और सही दिशा में प्रयास करने की है।

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