MAHENDRA SIINGH SHEKHAWAT बीकानेर, (समाचार सेवा)। अवैध परिवहन का फैलता जाल आज सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था के लिए गंभीर चुनौती बन चुका है। विशेष रूप से राज्य सड़क परिवहन निगमों जिन्हें आमजन रोडवेज के नाम से जानते हैं पर इसका सीधा और गहरा असर दिखाई दे रहा है। कभी ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों को जोड़ने वाली जीवनरेखा माने जाने वाले रोडवेज के विशाल बेड़े को आज अवैध रूप से संचालित वाहनों ने लगभग हाशिए पर ला खड़ा किया है।
बिना परमिट, बिना फिटनेस जांच और बिना किसी वैधानिक प्रक्रिया के सड़कों पर दौड़ रहे ये अवैध वाहन न केवल नियमों की धज्जियां उड़ा रहे हैं, बल्कि यात्रियों की जान को भी खतरे में डाल रहे हैं। इन वाहनों में न तो सुरक्षा मानकों का पालन होता है और न ही प्रशिक्षित चालक-कंडक्टर की व्यवस्था होती है। इसके बावजूद सस्ती और त्वरित सेवा के लालच में यात्री इनका उपयोग करने को मजबूर हैं। यह स्थिति न केवल चिंताजनक है, बल्कि व्यवस्था की विफलता को भी उजागर करती है।
फल-फूल रहा है अवैध परिवहन का कारोबार
सबसे गंभीर पहलू यह है कि अवैध परिवहन का यह कारोबार बिना किसी कर या शुल्क के फल-फूल रहा है। जहां एक ओर रोडवेज को टैक्स, डीजल कीमतों और वेतन जैसे भारी खर्चों का सामना करना पड़ता है, वहीं अवैध वाहन संचालक बिना किसी वित्तीय दायित्व के मोटी कमाई कर रहे हैं। इससे प्रतिस्पर्धा असमान हो जाती है और सरकारी परिवहन आर्थिक रूप से कमजोर होता चला जाता है।
प्रशासनिक स्तर पर भी सवाल उठना स्वाभाविक है। आरटीओ और डीटीओ जैसे जिम्मेदार विभागों की निष्क्रियता या कथित मिलीभगत इस समस्या को और बढ़ावा दे रही है। यदि समय रहते सख्त कार्रवाई नहीं की गई, तो रोडवेज जैसी सार्वजनिक सेवा का अस्तित्व ही खतरे में पड़ सकता है।
कड़े कानूनों का प्रभावी क्रियान्वयन जरूरी
समाधान स्पष्ट है, कड़े कानूनों का प्रभावी क्रियान्वयन, अवैध वाहनों पर नियमित कार्रवाई, और रोडवेज सेवाओं को आधुनिक एवं प्रतिस्पर्धी बनाना। साथ ही आमजन को भी जागरूक होना होगा कि सस्ती सुविधा के लालच में वे अपनी सुरक्षा से समझौता न करें। यदि सभी पक्ष मिलकर जिम्मेदारी निभाएं, तभी इस अव्यवस्था पर अंकुश लगाया जा सकता है और सार्वजनिक परिवहन को पुनः सशक्त बनाया जा सकता है।


