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प्यास पर मुनाफाखोरी : राजस्थान की परम्परा के विरुद्ध प्रवृत्ति

Profiteering from Thirst: A Trend Contrary to Rajasthan's Tradition

MAHENDRA SIINGH SHEKHAWAT बीकानेर, (समाचार सेवा)। राजस्थान की पहचान केवल उसके विशाल रेगिस्तान, किलों और संस्कृति से नहीं है, बल्कि उसकी मानवीय संवेदनाओं और अतिथि सत्कार की परम्परा से भी है। यहां सदियों से प्यासे को पानी पिलानासबसे बड़ा पुण्य माना गया है। गांवों-कस्बों में लोगों द्वारा प्याऊ लगाना, राहगीरों के लिए मटकों में शीतल जल रखना और गर्मी के मौसम में निःशुल्क जल सेवा करना राजस्थान की जीवनशैली का हिस्सा रहा है। ऐसे प्रदेश में यदि नहर बंदी के दौरान पीने के पानी के टैंकरों के नाम पर लूट मचाई जाए और आमजन की मजबूरी का आर्थिक शोषण किया जाए, तो यह केवल अनुचित व्यापार नहीं बल्कि राजस्थान की आत्मा और परम्परा के विरुद्ध आचरण है।

हर वर्ष नहरों के क्लोजर अथवा मरम्मत कार्य के दौरान अनेक शहरों और गांवों में जल संकट गहरा जाता है। विशेषकर पश्चिमी राजस्थान के क्षेत्रों में लोग पीने के पानी के लिए टैंकरों पर निर्भर हो जाते हैं। ऐसी परिस्थितियों में कुछ लोग मानवता और सामाजिक दायित्व को भूलकर पानी जैसी मूलभूत आवश्यकता को कमाई का माध्यम बना लेते हैं। सामान्य दिनों में जो टैंकर उचित दरों पर उपलब्ध होते हैं, वही क्लोजर के समय कई गुना अधिक कीमत पर बेचे जाने लगते हैं। मजबूरी में आमजन को ऊंचे दाम चुकाने पड़ते हैं। गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए यह स्थिति अत्यंत पीड़ादायक हो जाती है।

जीवन का आधार है पानी  

पानी कोई विलासिता की वस्तु नहीं बल्कि जीवन का आधार है। भारतीय संस्कृति में जल को देवतुल्य माना गया है। राजस्थान जैसे मरुस्थलीय प्रदेश में तो पानी का महत्व और अधिक है। यहां के लोगों ने सदियों तक कुएं, बावड़ियां, तालाब और टांके बनवाकर जल संरक्षण की मिसाल पेश की है। समाजसेवियों और भामाशाहों ने हमेशा कठिन समय में जनता की सहायता की है। ऐसे में जल संकट के समय मुनाफाखोरी करना सामाजिक मूल्यों के पतन का संकेत है।

नहर बंदी के दौरान बने समुचित योजना

आवश्यकता इस बात की है कि नहर बंदी के दौरान प्रशासन पहले से समुचित योजना बनाए। जलदाय विभाग और स्थानीय प्रशासन को टैंकरों की दरें निर्धारित कर सख्ती से लागू करनी चाहिए। अवैध वसूली करने वालों के विरुद्ध कठोर कार्यवाही होनी चाहिए। साथ ही समाज के सक्षम वर्ग, भामाशाहों और सामाजिक संगठनों को भी आगे आकर रियायती दरों पर अथवा निःशुल्क पानी उपलब्ध करवाने की व्यवस्था करनी चाहिए। जिस प्रकार गर्मियों में जगह-जगह प्याऊ लगाई जाती हैं, उसी प्रकार जल संकट के समय सामुदायिक सहयोग से जल सेवा अभियान चलाए जा सकते हैं।

प्यासे को पानी देना सबसे बड़ा धर्म

वास्तव में किसी भी समाज की पहचान उसके कठिन समय के व्यवहार से होती है। यदि संकट की घड़ी में भी लोग एक-दूसरे की सहायता करें, तभी सामाजिक एकता और मानवीयता जीवित रहती है। राजस्थान की गौरवशाली परम्परा हमें यही सिखाती है कि प्यासे को पानी देना सबसे बड़ा धर्म है, न कि उसकी मजबूरी पर लाभ कमाना। इसलिए पानी के टैंकरों में मुनाफाखोरी की प्रवृत्ति पर रोक लगाना केवल प्रशासनिक दायित्व नहीं बल्कि सामाजिक और नैतिक जिम्मेदारी भी है।

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