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प्रवेशोत्सव बनाम शिक्षा की वास्तविक जरूरतें

MAHENDRA SIINGH SHEKHAWAT बीकानेर, (समाचार सेवा)।   विद्यालयों में प्रवेशोत्सवअभियान चलाकर विद्यार्थियों के नव प्रवेश को बढ़ावा देने की परंपरा वर्षों से चली आ रही है। इसका उद्देश्य अधिकाधिक बच्चों को विद्यालयों से जोड़ना और शिक्षा के प्रति जागरूकता बढ़ाना रहा है। लेकिन बदलते सामाजिक और शैक्षिक परिदृश्य में अब यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या ऐसे अभियानों की प्रासंगिकता आज भी उतनी ही है जितनी पहले थी?

आज का समाज पहले की तुलना में कहीं अधिक जागरूक और शिक्षित हो चुका है। शायद ही कोई ऐसा परिवार होगा जो अपने बच्चों को विद्यालय न भेजना चाहता हो। शिक्षा अब केवल अधिकार नहीं, बल्कि जीवन की अनिवार्यता बन चुकी है। ऐसे में प्रवेशोत्सव जैसे आयोजनों पर संसाधन और समय खर्च करना कहीं न कहीं औपचारिकता अधिक और आवश्यकता कम प्रतीत होता है।

वास्तविकता यह है कि समस्या अब बच्चों को स्कूल तक लाने की नहीं, बल्कि उन्हें गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने की है। सरकारी विद्यालयों में आज भी आधारभूत सुविधाओं की कमी, शिक्षकों की अनुपलब्धता, आधुनिक तकनीक का अभाव और जर्जर भवन जैसी समस्याएं बनी हुई हैं। इन कमियों के चलते अभिभावक मजबूर होकर निजी विद्यालयों की ओर रुख करते हैं, जिससे आर्थिक बोझ भी बढ़ता है।

यदि शिक्षा विभाग वास्तव में सुधार चाहता है, तो उसे प्रवेशोत्सव जैसे अभियानों की बजाय विद्यालयों के बुनियादी ढांचे को मजबूत करने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। स्मार्ट क्लास, पर्याप्त शिक्षक, स्वच्छ और सुरक्षित वातावरण, खेलकूद की सुविधाएं और व्यावहारिक शिक्षा—ये वे पहलू हैं जो बच्चों को न केवल विद्यालय तक लाएंगे, बल्कि उन्हें वहां टिके रहने और आगे बढ़ने के लिए प्रेरित भी करेंगे।

शिक्षण की गुणवत्ता पर विशेष ध्यान देना आवश्यक

इसके अलावा, शिक्षण की गुणवत्ता पर विशेष ध्यान देना भी अत्यंत आवश्यक है। केवल नामांकन बढ़ाना ही सफलता का पैमाना नहीं होना चाहिए, बल्कि यह सुनिश्चित करना अधिक महत्वपूर्ण है कि विद्यार्थी वास्तव में सीख भी रहे हैं या नहीं। शिक्षकों के प्रशिक्षण, नई शिक्षण पद्धतियों और तकनीकी संसाधनों के समावेश से ही शिक्षा का स्तर सुधर सकता है।

लिहाजा यह कहा जा सकता है कि प्रवेशोत्सव जैसे अभियान अब अपनी उपयोगिता खो चुके हैं। आज जरूरत है शिक्षा के वास्तविक मुद्दों पर ध्यान देने की। जब विद्यालयों की गुणवत्ता बेहतर होगी, तो प्रवेश अपने आप बढ़ेगा—किसी उत्सव या अभियान की आवश्यकता नहीं पड़ेगी।

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