MAHENDRA SIINGH SHEKHAWAT बीकानेर, (समाचार सेवा)। वर्ष 1986 से अब तक करीब 38 वर्ष के पत्रकारिता के काल में आज पहली बार यह ज्ञात हुआ कि अगर आप पत्रकार के रूप में अपना परिचय देते हैं तो सामने वाले की निगाह में आपकी छवि तुरंत प्रभाव से खत्म हो जाती है।वो कार्य जो आप साधारण इंसान की हैसियत में बखूबी करवा सकते थे वो पत्रकार के रूप में किसी हाल में संभव नहीं। मैं मेरे एक रिश्तेदार के साथ किसी प्रतिष्ठित व्यवसाई के यहां किसी काम से गया, प्रतिष्ठित व्यवसाई ने बहुत इज्जत और मान सम्मान दिया। बातों ही बातों में मैने बड़े गौरव और आत्मसमान के साथ उनको बताया कि मैं पत्रकार हूं। इतना सुनते ही उनके चेहरे के तेवर बदल गए और उन्होंने जो कहा वो शर्मिंदा कर देने वाला था।
उन्होंने जो भी कुछ अपने अंदाज में कहा उसको वैसा ही कहना संभव ही नहीं लेकिन उनका जो मंतव्य था वो इस प्रकार था – सोशल मीडिया के नाम पर पोर्टल पर जबरन विज्ञापन लगा कर दो चार हजार रुपए मांगना पत्रकारिता है? एक्सीडेंट, बलात्कार, चोरी, मारपीट और पुलिस की एफआईआर को चटपटे अंदाज में ऑनलाइन पोर्टल्स पर प्रकाशित करना पत्रकारिता है? जिसका जी चाहे वही हाथ में पांच सौ रुपए में मिलने वाला यू ट्यूब माइक लेकर किसी से भी कभी भी कुछ भी पूछ ले ये पत्रकारिता है? जिनको ठीक से कपड़े पहनने का सलीका नहीं,जिनको ठीक से बोलना नहीं आता,जिनके मुंह गुटखे से भरे हों वो भी कुछ भी पूछ लें,ये पत्रकारिता है?
कुछ उखाड़ सकते हैं तो उखाड़ लीजिए
पीबीएम में गलत खून चढ़ा,रेलवे फाटक बीस बार बंद हुआ, केलक्ट्रेट पर धरना दिया,वेतन नहीं मिलने पर धरना दिया,बारिश हुई,ओले गिरे तो धरना दिया,कोई वीडियो वायरल हुआ तो अनेक पक्षों ने अपनी अपनी डफली बजाई ये पत्रकारिता है? उन 70 वर्षीय बुजुर्ग व्यवसाई ने इतने में ही बस नहीं किया,उन्होंने कहा कि आप कुछ भी हों,कुछ भी करते हों,और अपनी व्यक्तिगत कैपेसिटी में मेरे पास काम से आते तो आपका स्वागत था लेकिन आप पत्रकार के रूप में आए हैं तो माफ कीजिए,मैं कुछ नहीं कर सकता।आप अगर नाराज हो कर मेरा कुछ उखाड़ सकते हैं तो उखाड़ लीजिए।ब्लैकमेलर जमात से मैं बात नहीं करता,ये तो ठीक है कि आप फलां के साथ आए हैं इसलिए आप मेरे ऑफिस के भीतर बैठे हैं वरना पत्रकार की परिभाषा भी नहीं जानने वाली जमात को मैं किसी हाल में पसंद नहीं करता।
उनके शब्द बेहद तीखे और जहर बुझे थे
उन बुजुर्ग व्यवसाई ने जो और जैसा भी कहा, उसकी भावना यहां व्यक्त की है जबकि उनके शब्द बेहद तीखे और जहर बुझे थे। चाहे कितना भी तल्ख और बेरुखी बातें उन्होंने कही लेकिन मैं यह सोचता रह गया कि क्या ये सच कह रहे हैं? उन्होनें मेरे साथ गए मेरे रिश्तेदार के रसूख का हवाला देते हुए मुझे कहा कि आप इनके साथ आए हैं इसलिए और आपकी शालीन पर्सनेलिटी को देखते हुए आपका सम्मान था लेकिन आपने पत्रकार बता कर अपने आपको मेरी नजरों में हलका कर दिया।क्यों कि आप इनके साथ आए हैं इसलिए आपका काम तो मैं करूंगा लेकिन आपके कारण नहीं,जो आपके साथ आए हैं उनके सम्मान के कारण।
हकीकत जान कर मन खिन्न है
मैं किंकर्तव्यविमूढ़ अपना सा मुंह लिए करीब पौन घंटे तक उनका धाराप्रवाह भाषण सुनता रहा, इस बीच उनके फोन पर ऐसे ही एक पोर्टल वाले का फोन आ गया, उन्होंने स्पीकर ऑन करके सुनाया, सामने से कोई कह रहा था, आपके विज्ञापन को महीना हो गया, पांच हजार रुपए फोन पे कर दो। उन्होंने उन महाशय को कुछ नहीं कहा लेकिन फोन कट जाने के बाद उनके प्रति जो बात कही वो बेहद कड़वी थी। मैं सन्नाटे में हूं, पत्रकार का परिचय देते हुए मैं जिस गर्व की अनुभूति करता हूं उसकी हकीकत जान कर मन खिन्न है।
जो कुछ सामने आया, उसने भीतर तक झकझोर दिया
करीब 38 वर्षों के पत्रकारिता जीवन में आज पहली बार यह अहसास हुआ कि “पत्रकार” शब्द, जो कभी सम्मान और विश्वसनीयता का पर्याय हुआ करता था, अब कई जगहों पर संदेह और अविश्वास का कारण बन चुका है। यह अनुभव केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि उस व्यापक गिरावट की ओर इशारा करता है, जो धीरे-धीरे पत्रकारिता की साख को खोखला कर रही है। एक साधारण मुलाकात के दौरान जो कुछ सामने आया, उसने भीतर तक झकझोर दिया। जब तक परिचय सामान्य व्यक्ति के रूप में था, व्यवहार में आत्मीयता और सम्मान था, लेकिन जैसे ही “पत्रकार” शब्द जुड़ा, नजरों का नजरिया बदल गया। यह बदलाव अचानक नहीं था, बल्कि उस धारणा का परिणाम था, जो आज के समय में पत्रकारिता के नाम पर पनप रही प्रवृत्तियों ने गढ़ी है।
ऐसी भीड़ तैयार हो गई, जिसे पत्रकारिता की समझ नहीं
आज पत्रकारिता के नाम पर जो कुछ हो रहा है, उसने इस पेशे की गरिमा को गंभीर नुकसान पहुंचाया है। सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स ने अभिव्यक्ति को आसान बनाया, लेकिन इसके साथ ही एक ऐसी भीड़ भी तैयार हो गई, जिसे न तो पत्रकारिता के मूल्यों की समझ है और न ही उसकी जिम्मेदारी का अहसास। बिना किसी प्रशिक्षण या नैतिक आधार के, कोई भी व्यक्ति खुद को पत्रकार घोषित कर देता है।
सनसनी परोसने की लगी होड़
समस्या सिर्फ यहीं तक सीमित नहीं है। घटनाओं को तथ्यों के साथ नहीं, बल्कि सनसनी के साथ परोसने की होड़ लगी है। दुर्घटनाएं, अपराध, विवाद—सब कुछ एक “कंटेंट” बनकर रह गया है। इससे भी अधिक चिंताजनक बात यह है कि कुछ लोग पत्रकारिता की आड़ में आर्थिक लाभ के लिए दबाव बनाने जैसी प्रवृत्तियों में लिप्त हैं, जो इस पेशे को सीधे-सीधे ब्लैकमेलिंग के दायरे में ले आती हैं। ऐसी परिस्थितियों में जब कोई व्यक्ति “पत्रकार” शब्द सुनकर दूरी बना ले, तो उसे पूरी तरह गलत भी नहीं ठहराया जा सकता। यह उस सामूहिक छवि का परिणाम है, जिसे समय के साथ इस पेशे के भीतर आई विकृतियों ने जन्म दिया है।
जरूरत केवल आत्ममंथन की नहीं, बल्कि ठोस सुधार की है
हालांकि यह भी सच है कि आज भी अनेक पत्रकार पूरी ईमानदारी, निष्पक्षता और समर्पण के साथ कार्य कर रहे हैं। वे पत्रकारिता के मूल उद्देश्य—सत्य को सामने लाना और समाज को जागरूक करना—को निभा रहे हैं। लेकिन दुर्भाग्यवश उनकी पहचान इस अव्यवस्थित और अनियंत्रित भीड़ में धुंधली पड़ती जा रही है। आज जरूरत केवल आत्ममंथन की नहीं, बल्कि ठोस सुधार की है। पत्रकारिता को फिर से उसकी मूल भावना तक लौटाना होगा, जहां जिम्मेदारी, मर्यादा और सत्य सर्वोपरि हों। जब तक यह बदलाव नहीं आता, तब तक “पत्रकार” शब्द के साथ जुड़ा यह अविश्वास खत्म होना मुश्किल है। यह अनुभव एक कड़वी सच्चाई को उजागर करता है—पत्रकारिता का संकट बाहर से नहीं, भीतर से पैदा हुआ है। और अगर इसे सुधारा नहीं गया, तो आने वाले समय में यह संकट और गहराता जाएगा।


