MAHENDRA SIINGH SHEKHAWAT बीकानेर, (समाचार सेवा)। लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनसुनवाई का उद्देश्य जनता और शासन के बीच संवाद स्थापित करना तथा समस्याओं के त्वरित समाधान का मार्ग प्रशस्त करना होता है। सिद्धांत रूप में यह व्यवस्था अत्यंत उपयोगी और आवश्यक है, किंतु व्यवहार में कई बार जनसुनवाई केवल एक औपचारिक कार्यक्रम बनकर रह जाती है। जनता अपनी समस्याएं लेकर पहुंचती है, अधिकारी और जनप्रतिनिधि उन्हें सुनते हैं, आश्वासन दिए जाते हैं, लेकिन अधिकांश मामलों में परिणाम अपेक्षित नहीं मिल पाते। यही कारण है कि आज अनेक लोगों के मन में यह प्रश्न उठने लगा है कि आखिर जनसुनवाई से वास्तविक लाभ कितना हो रहा है।
हाल ही में श्रीडूंगरगढ़ में आयोजित एक जनसुनवाई के दौरान एक युवक द्वारा अव्यवस्थाओं को लेकर खुलकर अपनी बात रखना इस बात का संकेत है कि जनता के भीतर समस्याओं के समाधान को लेकर निराशा और असंतोष मौजूद है। यह असंतोष किसी एक क्षेत्र या व्यक्ति तक सीमित नहीं है। वर्षों से विभिन्न स्तरों पर जनसुनवाई, शिविर और शिकायत निवारण कार्यक्रम आयोजित होते रहे हैं, लेकिन यदि समस्याएं बार-बार उसी रूप में सामने आ रही हैं तो यह व्यवस्था की प्रभावशीलता पर प्रश्नचिह्न अवश्य लगाता है।
“स्टेटस सिंबल” का रूप लेती जनसुनवाई
दुर्भाग्य से जनसुनवाई कई स्थानों पर एक प्रकार के “स्टेटस सिंबल” का रूप लेती दिखाई देती है। किसी कार्यक्रम में कितनी भीड़ जुटी, कितने ज्ञापन मिले और कितने लोगों ने अपनी बात रखी, इसे सफलता का पैमाना मान लिया जाता है। जबकि वास्तविक सफलता का मापदंड यह होना चाहिए कि प्राप्त शिकायतों में से कितनी का समाधान हुआ, कितनी समस्याएं दोबारा सामने नहीं आईं और जनता के जीवन में कितना सकारात्मक परिवर्तन आया।
आवश्यकता ही नहीं जनसुनवाई की
वास्तविकता यह है कि यदि प्रशासनिक व्यवस्था नियमित रूप से संवेदनशील, जवाबदेह और सक्रिय रहे तो अधिकांश समस्याओं के लिए जनसुनवाई की आवश्यकता ही नहीं पड़े। सड़क, बिजली, पानी, स्वास्थ्य, शिक्षा और राजस्व जैसे विषयों पर संबंधित विभाग यदि समयबद्ध कार्रवाई करें तो लोगों को अपनी शिकायत लेकर बार-बार अधिकारियों और मंत्रियों के सामने नहीं जाना पड़ेगा। जनसुनवाई एक आपात या विशेष व्यवस्था हो सकती है, लेकिन इसे नियमित प्रशासन का विकल्प नहीं बनाया जा सकता।
जनता समाधान चाहती है
जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों को यह समझना होगा कि जनता केवल सुने जाने से संतुष्ट नहीं होती, वह समाधान चाहती है। लोकतंत्र में जनता का विश्वास तब मजबूत होता है जब समस्याओं का निवारण दिखाई देता है, न कि केवल आश्वासनों की पुनरावृत्ति। इसलिए आवश्यक है कि जनसुनवाई कार्यक्रमों को आंकड़ों और भीड़ से नहीं, बल्कि परिणामों से आंका जाए। प्रत्येक शिकायत पर कार्रवाई की निगरानी हो, जवाबदेही तय हो और समाधान की समयसीमा निर्धारित की जाए।
कार्रवाई में निहित है लोकतंत्र की सफलता
अंततः जनसुनवाई का उद्देश्य राजनीतिक या प्रशासनिक प्रतिष्ठा बढ़ाना नहीं, बल्कि जनविश्वास को सुदृढ़ करना होना चाहिए। जिस दिन व्यवस्था ऐसी बन जाएगी कि अधिकांश समस्याओं का समाधान अपने स्तर पर होने लगे, उस दिन जनसुनवाई की आवश्यकता स्वतः कम हो जाएगी। लोकतंत्र की सफलता सुनने में नहीं, बल्कि सुनकर प्रभावी कार्रवाई करने में निहित है।


