Loading Now

updates

प्रेस को आत्ममंथन और अपनी सार्थक भूमिका तय करने की है सख्‍त जरूरत

The press is in dire need of self-introspection and of defining its meaningful role.

MAHENDRA SIINGH SHEKHAWAT बीकानेर, (समाचार सेवा)।  पत्रकारों को रेलवे में रियायती यात्रा सुविधा लंबे समय से बंद है और इसे पुनः शुरू करने की मांग देशभर में लगातार उठ रही है। संसद से लेकर सड़क तक, पत्रकार संगठनों से लेकर व्यक्तिगत स्तर तक, इस विषय पर आवाजें उठती रही हैं। ऐसे में यदि केन्‍द्रीय मंत्री और स्थानीय सांसद इस मांग से अनभिज्ञता जताते हैं, तो यह स्वाभाविक रूप से आश्चर्य और प्रश्न दोनों खड़े करता है।

बीकानेर में हाल ही में हुए एक समारोह के दौरान जब पत्रकारों ने यह मुद्दा मंत्री के सामने रखा, तो उनका आश्चर्य प्रकट करना कई मायनों में असहज करने वाला था। यह वही विषय है जिस पर मार्च 2026 में लोकसभा में सांसदों द्वारा चर्चा की जा चुकी है। पत्रकार संगठनों, विशेषकर राष्ट्रीय स्तर के पत्रकार संघों ने भी बार-बार इस सुविधा की बहाली की मांग की हुई है। इसके बावजूद यदि जिम्मेदार पद पर बैठे व्यक्ति को इसकी जानकारी नहीं है, तो यह या तो सूचना तंत्र की कमजोरी दर्शाता है या फिर संवेदनशीलता की कमी।

और भी चिंताजनक बात यह है कि जिम्‍मेदार जनप्रतिनिधियों के इस तरह के जवाबों पर पत्रकारों द्वारा तालियां बजाना। पत्रकारिता का मूल स्वभाव सवाल पूछना, जवाबदेही तय करना और सत्ता से जवाब मांगना है न कि उसे सहजता से स्वीकार कर लेना। जब प्रेस स्वयं ही अपने मुद्दों पर गंभीरता नहीं दिखाएगा, तो फिर समाज उससे क्या अपेक्षा करेगा? यह प्रसंग केवल रेलवे रियायत तक सीमित नहीं है। पत्रकारों को प्लॉट आवंटन जैसे अन्य लंबित और चर्चित मामलों पर भी मंत्री की अनभिज्ञता सामने आई। क्या यह भी बाकी है? जैसे प्रश्न न केवल स्थिति की गंभीरता को हल्का करते हैं, बल्कि यह भी संकेत देते हैं कि संवाद और समन्वय कहीं न कहीं कमजोर पड़ा है।

लिखित में दीजिए कहना भी एक औपचारिकता  

ऐसे मामलों में बार-बार लिखित में दीजिए कहना भी एक औपचारिकता भर लगता है, क्योंकि ये मांगें नई नहीं, बल्कि वर्षों से चली आ रही हैं। लोकतंत्र में प्रेस को चौथा स्तंभ कहा जाता है। यह उपमा केवल सम्मान का प्रतीक नहीं, बल्कि जिम्मेदारी का भी बोध कराती है। यदि यही स्तंभ अपनी ही समस्याओं पर ढीला रुख अपनाएगा, तो उसकी विश्वसनीयता प्रभावित होना स्वाभाविक है। सत्ता से संवाद आवश्यक है, लेकिन वह संवाद सम्मानजनक और सार्थक होना चाहिए न कि औपचारिक और सतही।

इस पूरे घटनाक्रम से दो स्पष्ट संदेश उभरते हैं। पहला, जनप्रतिनिधियों को अपने क्षेत्र और उससे जुड़े महत्वपूर्ण वर्गों की समस्याओं से अद्यतन और संवेदनशील रहना चाहिए। दूसरा, पत्रकारों को भी अपनी गरिमा, गंभीरता और पेशेवर मूल्यों को बनाए रखते हुए अपनी बात मजबूती से रखनी चाहिए। समय की मांग है कि प्रेस आत्ममंथन करे और अपनी भूमिका को पुनः परिभाषित करते हुए उसी दृढ़ता और निष्पक्षता के साथ खड़ा हो, जिसकी अपेक्षा लोकतंत्र उससे करता है।

Share this content:

You May Have Missed