MAHENDRA SIINGH SHEKHAWAT बीकानेर, (समाचार सेवा)। ग्रामीण क्षेत्रों और शहरों की झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वाले अनेक बच्चे आज भी स्कूल से दूर हैं। शिक्षा का अधिकार कानून होने के बावजूद बड़ी संख्या में ऐसे बच्चे हैं जो या तो स्कूल तक पहुँच ही नहीं पाते या कुछ समय बाद पढ़ाई छोड़ देते हैं। यह स्थिति केवल शिक्षा व्यवस्था की नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए चिंता का विषय है।
बच्चों के स्कूल से ड्रॉप आउट होने के पीछे कई सामाजिक और आर्थिक कारण हैं। सबसे प्रमुख कारण गरीबी है। गरीब परिवारों में बच्चों को अक्सर पढ़ाई से ज्यादा घर की जिम्मेदारियों या मजदूरी में लगना पड़ता है। कई बार माता-पिता की आर्थिक स्थिति इतनी कमजोर होती है कि वे बच्चों की पढ़ाई से जुड़े छोटे-छोटे खर्च भी नहीं उठा पाते। इसके अलावा कुछ बच्चे ऐसे भी होते हैं जिनके माता-पिता या अभिभावक नहीं होते, जिससे उनकी शिक्षा का मार्ग और कठिन हो जाता है। ग्रामीण क्षेत्रों में स्कूलों की दूरी, परिवहन की कमी, शिक्षकों की अनुपलब्धता और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का अभाव भी बच्चों के पढ़ाई छोड़ने के प्रमुख कारणों में शामिल हैं।
अपेक्षित सफलता नहीं मिल पाई
वहीं शहरों के स्लम क्षेत्रों में रहने वाले बच्चों को अस्थिर जीवन, बार-बार स्थान परिवर्तन और पारिवारिक असुरक्षा जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है, जो उनकी शिक्षा को प्रभावित करती हैं। हालांकि शिक्षा विभाग द्वारा बच्चों को स्कूलों की ओर आकर्षित करने के लिए अनेक योजनाएं चलाई जा रही हैं। निःशुल्क पाठ्यपुस्तकें, मध्याह्न भोजन, छात्रवृत्तियां और विभिन्न प्रोत्साहन योजनाएं इस दिशा में सकारात्मक प्रयास हैं। इसके बावजूद अपेक्षित सफलता नहीं मिल पाई है। इसका मुख्य कारण यह है कि केवल सरकारी योजनाएं ही पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि समाज की सक्रिय भागीदारी भी जरूरी है।
सामाजिक आंदोलन के रूप में देखा जाए
जरूरत इस बात की है कि शिक्षा को केवल सरकारी जिम्मेदारी न मानकर सामाजिक आंदोलन के रूप में देखा जाए। ग्राम पंचायतों, सामाजिक संगठनों और स्थानीय समुदाय को भी इस दिशा में सक्रिय भूमिका निभानी होगी। साथ ही ऐसे बच्चों की पहचान कर उन्हें विशेष सहायता और प्रेरणा प्रदान करना भी आवश्यक है।
यदि हम वास्तव में एक विकसित और सशक्त समाज का निर्माण करना चाहते हैं तो यह सुनिश्चित करना होगा कि कोई भी बच्चा शिक्षा से वंचित न रहे। क्योंकि स्कूल से दूर होता हर बच्चा केवल एक विद्यार्थी का नुकसान नहीं, बल्कि देश के भविष्य का नुकसान है।


