MAHENDRA SIINGH SHEKHAWAT बीकानेर, (समाचार सेवा)। अभिव्यक्ति का अर्थ स्वच्छंदता नहीं, बल्कि उत्तरदायित्व है। यह केवल अपनी बात कहने की स्वतंत्रता नहीं देता, बल्कि यह भी सिखाता है कि क्या, कब और कैसे कहा जाए। किसी भी समाज में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तभी सार्थक होती है जब वह नैतिक मूल्यों, सांस्कृतिक संवेदनशीलता और सामाजिक मर्यादाओं के साथ संतुलित रहे। आज के दौर में, विशेषकर सोशल मीडिया के प्रसार के बाद, अभिव्यक्ति को अक्सर निरंकुशता के रूप में प्रस्तुत किया जाने लगा है, जो चिंताजनक है।
रूस की बोलशेविक क्रांति के बाद का एक दृष्टांत इस विषय को स्पष्ट करता है। एक महिला सड़क के बीचों-बीच चल रही थी और ट्रक चालक के बार-बार हॉर्न बजाने पर भी किनारे नहीं हो रही थी। उसने तर्क दिया कि अब वह स्वतंत्र है, जहां चाहे चल सकती है। इस पर चालक ने कहा कि उसे भी सड़क पर चलने की स्वतंत्रता मिली है, तो क्या वह ट्रक उसके ऊपर चढ़ा दे? यह प्रसंग स्पष्ट करता है कि यदि स्वतंत्रता के साथ सीमाएं न हों, तो वह अराजकता का रूप ले लेती है।
आज हमारे समाज में भी यही स्थिति देखने को मिल रही है। अभिव्यक्ति के नाम पर ऐसी बातें कही जा रही हैं, जो न केवल व्यक्तिगत भावनाओं को आहत करती हैं, बल्कि सामाजिक सौहार्द और सांस्कृतिक मूल्यों को भी कमजोर करती हैं। स्वतंत्रता का दुरुपयोग जब स्वार्थ, प्रसिद्धि या उग्रता के लिए किया जाता है, तो उसका परिणाम समाज के विघटन के रूप में सामने आता है।
अभिव्यक्ति का अधिकार लोकतंत्र का एक महत्वपूर्ण स्तंभ
अभिव्यक्ति का अधिकार लोकतंत्र का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है, लेकिन इसके साथ कर्तव्यों का निर्वहन भी उतना ही आवश्यक है। यदि हम अपनी बात कहते समय दूसरों के अधिकारों, भावनाओं और सामाजिक संतुलन का ध्यान नहीं रखते, तो यह स्वतंत्रता नहीं, बल्कि अविवेक बन जाती है। नैतिकता और मर्यादा के दायरे में रहकर की गई अभिव्यक्ति ही समाज को दिशा देती है और विकास का मार्ग प्रशस्त करती है।
इसलिए यह आवश्यक है कि हम अभिव्यक्ति को अधिकार के साथ-साथ उत्तरदायित्व के रूप में भी समझें। सीमाओं का पालन करते हुए अपनी बात कहना ही सच्ची स्वतंत्रता है। यही संतुलन हमें एक सशक्त, सभ्य और समरस समाज की ओर ले जा सकता है।


