MAHENDRA SIINGH SHEKHAWAT बीकानेर, (समाचार सेवा)। भारत की शिक्षा व्यवस्था केवल ज्ञान प्राप्ति का माध्यम नहीं रही, बल्कि यह जीवन मूल्यों, नैतिकता और अध्यात्म के विकास का भी आधार रही है। प्राचीन काल में भारतीय शिक्षा का स्वरूप गुरुकुल परम्परा पर आधारित था, जिसमें शिक्षा का उद्देश्य केवल बौद्धिक विकास नहीं बल्कि व्यक्ति के समग्र व्यक्तित्व का निर्माण करना था। आज के समय में जब शिक्षा अधिकतर रोजगार केंद्रित हो गई है, तब भारतीय सनातन परम्पराओं और अध्यात्म को शिक्षा में पुनः स्थान देने की आवश्यकता महसूस की जा रही है।
नई शिक्षा नीति ने इसी आवश्यकता को समझते हुए भारतीय ज्ञान परम्परा और गुरुकुल प्रणाली का उल्लेख किया है। इसका उद्देश्य विद्यार्थियों को केवल आधुनिक विज्ञान और तकनीक तक सीमित न रखकर उन्हें भारतीय संस्कृति, दर्शन और अध्यात्म से भी जोड़ना है। इसी दिशा में भारतीय शिक्षा बोर्ड की स्थापना एक महत्वपूर्ण पहल मानी जा सकती है। यह प्रयास भारतीय पौराणिक, वैदिक और सांस्कृतिक ज्ञान को शिक्षा की मुख्यधारा में पुनर्स्थापित करने का माध्यम बन सकता है।
भारतीय वांग्मय में वेद, उपनिषद, पुराण और अनेक शास्त्रों के माध्यम से जीवन के गूढ़ रहस्यों, नैतिक मूल्यों और सामाजिक व्यवस्था का गहन वर्णन मिलता है। यदि इनका सार आधुनिक शिक्षा के साथ समन्वित रूप में विद्यार्थियों तक पहुंचे तो यह उनके व्यक्तित्व को अधिक संतुलित और संस्कारित बनाने में सहायक हो सकता है। गुरुकुल परम्परा में गुरु और शिष्य के बीच केवल ज्ञान का आदान-प्रदान ही नहीं बल्कि जीवन जीने की कला भी सिखाई जाती थी।
शिक्षा अभी सीमित दायरे तक ही केंद्रित
हालांकि राज्यों में कार्यरत संस्कृत अकादमियों का भी यह दायित्व रहा है कि वे गुरुकुलों के माध्यम से वेद, वेदांग और कर्मकांड की शिक्षा का प्रसार करें। अनेक स्थानों पर यह कार्य सफलतापूर्वक किया भी जा रहा है। फिर भी यह शिक्षा अभी सीमित दायरे तक ही केंद्रित है। यदि सामान्य विद्यालयों में भी इसे बोर्ड प्रणाली के माध्यम से सुव्यवस्थित रूप में शामिल किया जाए तो इसका प्रभाव व्यापक हो सकता है।
अतीत की ओर लौटना समाधान नहीं
यह आवश्यक है कि भारतीय परम्पराओं और आधुनिक शिक्षा के बीच संतुलन बनाया जाए। केवल अतीत की ओर लौटना समाधान नहीं है, बल्कि अतीत की श्रेष्ठ परम्पराओं को वर्तमान की आवश्यकताओं के साथ जोड़ना ही वास्तविक प्रगति है। यदि शिक्षा में भारतीय सनातन विचार, अध्यात्म और सांस्कृतिक मूल्यों को समुचित स्थान मिलता है, तो यह न केवल ज्ञान बल्कि चरित्र निर्माण की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण कदम सिद्ध होगा।


