संपादकीय
MAHENDRA SIINGH SHEKHAWAT बीकानेर, (समाचार सेवा)। हर वर्ष महिला दिवस के अवसर पर महिलाओं के सम्मान, अधिकार और सशक्तिकरण को लेकर अनेक कार्यक्रम, भाषण और आयोजन होते हैं। मंचों से महिलाओं को देवी का दर्जा देने, उनकी महिमा का गुणगान करने और उन्हें समाज की शक्ति बताने की बातें कही जाती हैं। यह सब सुनने में अच्छा लगता है, लेकिन असली प्रश्न यह है कि क्या महिलाओं को सच में देवी बनाना ही उनका सम्मान है?
भारतीय समाज में अक्सर महिलाओं को देवी के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। यह एक प्रकार की सांस्कृतिक श्रद्धा का प्रतीक जरूर है, लेकिन कई बार यही सोच महिलाओं को एक सामान्य इंसान के रूप में देखने से रोक देती है। देवी बनाकर हम उनसे असाधारण सहनशीलता, त्याग और समर्पण की उम्मीद करने लगते हैं। इससे उनके मानवीय अधिकार, भावनाएं और जरूरतें कहीं पीछे छूट जाती हैं।
वास्तविकता यह है कि महिला भी पुरुष की तरह एक इंसान है। उसे देवी बनाकर पूजने से अधिक आवश्यक है कि उसे बराबरी का अधिकार दिया जाए। उसके साथ सम्मानजनक व्यवहार हो, उसे निर्णय लेने की स्वतंत्रता मिले और उसके सपनों को भी उतनी ही अहमियत दी जाए जितनी पुरुषों के सपनों को दी जाती है।
संवेदनशीलता का व्यवहार किया जाए
समाज में महिलाओं के प्रति सम्मान का असली अर्थ यह नहीं है कि साल में एक दिन उनके सम्मान में बड़े-बड़े कार्यक्रम कर दिए जाएं या उन्हें देवी का दर्जा दे दिया जाए। असली सम्मान तब होगा जब घर, कार्यस्थल और समाज में उनके साथ समानता और संवेदनशीलता का व्यवहार किया जाए। जब उन्हें सुरक्षा, शिक्षा और अवसरों में बराबरी मिलेगी, तभी महिला सशक्तिकरण का वास्तविक अर्थ सामने आएगा।
आज जरूरत इस बात की है कि महिलाओं को आदर्श या देवी के रूप में स्थापित करने के बजाय उन्हें उनके वास्तविक स्वरूप में स्वीकार किया जाए। वे भी भावनाओं, इच्छाओं और सपनों से भरी एक सामान्य इंसान हैं। उन्हें पूजा के स्थान पर सम्मान और बराबरी चाहिए।
सोच बदलनी होगी
यदि समाज सच में महिलाओं को आगे बढ़ते देखना चाहता है, तो सबसे पहले अपनी सोच बदलनी होगी। महिला को देवी बनाने के बजाय उसे एक सम्मानित इंसान के रूप में स्वीकार करना ही सबसे बड़ा सम्मान है। जब यह सोच समाज में स्थापित हो जाएगी, तभी महिला दिवस की सार्थकता भी वास्तव में सिद्ध होगी।


