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मंडी विकास समितियों की नई व्यवस्था पर अनिश्चितता, 1 अप्रैल से होंगे बदलाव

MAHENDRA SIINGH SHEKHAWAT बीकानेर, (समाचार सेवा)। बीकानेर  जिले की आठ मंडी विकास समितियों के संचालन और भविष्य को लेकर असमंजस की स्थिति है। खास बात यह है कि 1 अप्रैल के बाद इन समितियों का संचालन किस प्रकार होगा, यह अभी तक स्पष्ट नहीं हो पाया है। दरअसल, राज्य सरकार ने सितंबर 2025 में एक आदेश जारी कर बीकानेर में अतिरिक्त कलेक्टर (मंडी) से मंडी समितियों का प्रभार हटाकर संबंधित उपखंड अधिकारियों (एसडीएम) को सौंप दिया था।

आदेश के अनुसार मंडी समितियों के समस्त अभिलेख भी संबंधित एसडीएम कार्यालयों को हस्तांतरित कर दिए गए थे। इसके बाद से ही इन समितियों का संचालन संबंधित उपखंड अधिकारियों के जिम्मे है। बीकानेर जिले में कुल आठ मंडी विकास समितियां कार्यरत हैं। इनमें खाजूवाला, लूणकरणसर, दंतौर, बज्जू, पूगल, आरडी 465, छतरगढ़ और गौडू की मंडी समितियां शामिल हैं। वर्तमान व्यवस्था के अनुसार इन सभी समितियों का प्रभार 31 मार्च तक संबंधित उपखंड अधिकारियों के पास ही रहेगा। लेकिन इसके बाद व्यवस्था क्या होगी, इस बारे में प्रशासनिक स्तर पर अभी तक कोई स्पष्ट निर्णय सामने नहीं आया है।

इस पूरे मामले में एक और रोचक स्थिति यह है कि सिंचित क्षेत्र विकास (सीएडी) विभाग में अतिरिक्त कलेक्टर (मंडी) का पद अभी भी यथावत बना हुआ है। हालांकि इस पद पर नियुक्त अधिकारी की भूमिका और कार्य क्या हैं, यह स्पष्ट रूप से सामने नहीं आ पा रहा है। जानकारों का कहना है कि पिछले करीब दो दशकों से यह पद नियमित नियुक्ति के बजाय केवल अतिरिक्त प्रभार के आधार पर ही संचालित होता रहा है। वर्तमान में अतिरिक्त कलेक्टर (मंडी) का चार्ज सीएडी की उपयुक्त हरीतिमा के पास बताया जा रहा है। लेकिन मंडी समितियों का वास्तविक संचालन एसडीएम के जिम्मे होने के कारण इस पद की उपयोगिता पर भी सवाल उठने लगे हैं।

मंडी समितियों का पूरा प्रभार एसडीएम को

प्रशासनिक हलकों में चर्चा है कि जब मंडी समितियों का पूरा प्रभार एसडीएम को सौंप दिया गया है तो फिर अतिरिक्त कलेक्टर (मंडी) पद की भूमिका स्पष्ट क्यों नहीं की जा रही। मंडी विकास समितियों के पास बड़ी संख्या में भूखंड भी उपलब्ध हैं, जिनके माध्यम से राज्य सरकार को अच्छा खासा राजस्व प्राप्त हो सकता है। एक अनुमान के अनुसार जिले की इन मंडी समितियों के पास लगभग पांच हजार से अधिक प्लॉट उपलब्ध हैं। यदि इन प्लॉटों की नियमित रूप से नीलामी की जाए तो राज्य सरकार को करोड़ों रुपये का राजस्व प्राप्त हो सकता है। लेकिन आश्चर्यजनक रूप से एसडीएम के पास मंडी समितियों का प्रभार होने के बावजूद अब तक किसी भी समिति में प्लॉट्स की नीलामी नहीं करवाई गई है। इससे न केवल राजस्व की संभावनाएं प्रभावित हो रही हैं बल्कि मंडी विकास से जुड़े कई कार्य भी ठप पड़े हुए हैं।

विकास कार्यों को मिल सकती है गति 

जानकारों का कहना है कि यदि इन प्लॉट्स की व्यवस्थित तरीके से नीलामी करवाई जाए तो इससे मंडियों के विकास कार्यों को भी गति मिल सकती है और राज्य सरकार को अतिरिक्त आय का स्रोत भी प्राप्त हो सकता है। लेकिन वर्तमान में नीलामी प्रक्रिया शुरू नहीं होने से यह संभावित राजस्व फिलहाल ठंडे बस्ते में पड़ा हुआ है। प्रशासनिक सूत्रों के अनुसार अतिरिक्त कलेक्टर (मंडी) का पद लंबे समय से केवल चार्ज व्यवस्था पर ही चल रहा है और इस पद पर स्थाई नियुक्ति नहीं की गई है। ऐसे में मंडी समितियों के प्रभावी संचालन और विकास कार्यों में भी बाधाएं सामने आती रही हैं। अब जिले में 31 मार्च की समय सीमा नजदीक आने के साथ ही यह सवाल उठने लगा है कि 1 अप्रैल के बाद मंडी विकास समितियों का संचालन किसके जिम्मे होगा।

यदि इस संबंध में समय रहते स्पष्ट निर्णय नहीं लिया गया तो मंडी प्रशासन और विकास कार्यों पर इसका प्रतिकूल असर पड़ सकता है। जिले के व्यापारियों और कृषि क्षेत्र से जुड़े लोगों का भी मानना है कि मंडी समितियों की व्यवस्था को स्पष्ट और मजबूत बनाने की जरूरत है, ताकि मंडियों का विकास हो सके और राज्य सरकार को मिलने वाला संभावित राजस्व भी बढ़ाया जा सके। फिलहाल पूरे मामले में प्रशासनिक स्पष्टता का इंतजार किया जा रहा है।

इनका कहना है

सीएडी के अधीन कार्यरत मंडी विकास समिति कार्यालय में सीएडी के ही कर्मचारी डेप्युटेशन पर होते हैं। फिलहाल मंडी विकास समिति के पास कोई कार्य नहीं है क्यों कि संबंधित एसडीएम ही अब मंडी के कार्य देखते हैं। 31 मार्च के बाद राज्य सरकार का क्या आदेश होता है ये अभी तय नहीं है।

हरीतिमा,

आरएएस

उपयुक्त सीएडी एवं इंचार्ज अतिरिक्त कलक्टर(मंडी) बीकानेर।

 

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