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बिना योजना के विकास की कीमत

MAHENDRA SIINGH SHEKHAWAT बीकानेर, (समाचार सेवा)। विकास केवल संसाधनों से नहीं, बल्कि दूरदृष्टि और सुविचारित योजना से संभव होता है। जब कार्य बिना ठोस प्लानिंग के किए जाते हैं, तो उसका खामियाजा केवल किसी एक विभाग को नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम को भुगतना पड़ता है। यही स्थिति सीएडी, उपनिवेशन और सिंचाई विभागों के संदर्भ में स्पष्ट रूप से देखने को मिलती है। इन तीनों विभागों का गठन आमजन के समग्र और संतुलित विकास के उद्देश्य से किया गया था, लेकिन आज इनके अपेक्षित परिणाम धरातल पर दिखाई नहीं देते।

वास्तव में, इन विभागों के लिए जो योजनाएं बनाई गई थीं, वे अपने समय से आगे और अत्यंत वैज्ञानिक थीं। अनुभवी अधिकारियों और तकनीकविदों ने क्षेत्र की भौगोलिक, सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए जो खाका तैयार किया, वह किसी भी दृष्टि से कमजोर नहीं था। यदि उन योजनाओं का आधा हिस्सा भी ईमानदारी से लागू हो जाता, तो आज यह क्षेत्र विकास की नई मिसाल बन सकता था।

नहरों में पर्याप्त क्यूसेक क्षमता का पानी सुनिश्चित

नहरों में पर्याप्त क्यूसेक क्षमता का पानी सुनिश्चित करना, सीपेज को रोकना, पानी की चोरी पर नियंत्रण, चकों का सुनियोजित विकास, व्यवस्थित उपनिवेशन और मंडियों का सुदृढ़ नेटवर्क,ये सभी ऐसे बिंदु थे जो ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत आधार दे सकते थे। इसके साथ ही कृषि और वनीकरण पर विशेष ध्यान देने की परिकल्पना भी की गई थी, जिससे पर्यावरणीय संतुलन के साथ-साथ किसानों की आय में वृद्धि संभव थी।

योजनाओं का क्रियान्वयन अपेक्षित गंभीरता से नहीं  

लेकिन दुर्भाग्यवश, इन योजनाओं का क्रियान्वयन अपेक्षित गंभीरता और निरंतरता के साथ नहीं हो पाया। नीतियों और जमीनी हकीकत के बीच की खाई बढ़ती गई। नहरों में पानी की कमी, रिसाव की समस्या, अव्यवस्थित बसावट और कमजोर कृषि ढांचा आज भी क्षेत्र के पिछड़ेपन के प्रमुख कारण बने हुए हैं।

यह स्थिति केवल प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि विकास की सोच में आई शिथिलता का परिणाम है। जरूरत इस बात की है कि पुरानी योजनाओं की समीक्षा कर उन्हें वर्तमान संदर्भ में पुनर्जीवित किया जाए। जवाबदेही तय हो, पारदर्शिता बढ़े और कार्यान्वयन में स्थानीय सहभागिता सुनिश्चित की जाए।

अगर अब भी ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो यह क्षेत्र संभावनाओं के बावजूद पिछड़ेपन का दंश झेलता रहेगा। विकास के लिए केवल योजना बनाना पर्याप्त नहीं, बल्कि उसे ईमानदारी से जमीन पर उतारना ही असली कसौटी है।

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