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पत्रकारिता बनाम सूचना तंत्र: दिशा और दायित्व पर पुनर्विचार

Journalism vs. the Information System: Reconsidering Direction and Responsibility

MAHENDRA SIINGH SHEKHAWAT बीकानेर, (समाचार सेवा)। पिछले कुछ समय से पत्रकारिता को लेकर चल रही चर्चाएं इस बात का संकेत हैं कि यह क्षेत्र एक महत्वपूर्ण संक्रमण काल से गुजर रहा है। हर व्यक्ति अपनी समझ और अनुभव के आधार पर पत्रकारिता की परिभाषा गढ़ रहा है, लेकिन वास्तविकता यह है कि आज पत्रकारिता का स्वरूप काफी हद तक बदलकर एक तेज़-तर्रार सूचना तंत्र में परिवर्तित हो गया है। यह बदलाव तकनीकी विकास और डिजिटल माध्यमों के विस्तार का परिणाम तो है, किंतु इसके साथ कई गंभीर चुनौतियां भी सामने आई हैं।

वर्तमान समय में सूचना की गति इतनी तेज़ हो गई है कि सबसे पहले और सबसे अलग खबर देने की होड़ ने पत्रकारिता के मूल उद्देश्य को पीछे धकेल दिया है। सत्यता, संतुलन और गहन विश्लेषण जैसे मूलभूत तत्व धीरे-धीरे हाशिए पर जाते दिखाई दे रहे हैं। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स ने हर व्यक्ति को एक तरह से सूचना प्रसारक बना दिया है, जहां फॉलोअर्स की संख्या ही विश्वसनीयता का पैमाना बनती जा रही है। इस प्रवृत्ति ने न केवल पेशेवर पत्रकारिता को चुनौती दी है, बल्कि समाज में भ्रम और आधी-अधूरी जानकारियों के प्रसार को भी बढ़ावा दिया है।

पत्रकारिता का मूल उद्देश्य केवल सूचना देना नहीं

पत्रकारिता का मूल उद्देश्य केवल सूचना देना नहीं, बल्कि समाज को जागरूक करना, सच्चाई को सामने लाना और सत्ता व व्यवस्था के प्रति जवाबदेही सुनिश्चित करना है। जब यह दायित्व केवल ‘वायरल होने’ या ‘ट्रेंडिंग’ में सिमट जाता है, तो लोकतंत्र की नींव कमजोर होने लगती है। एक स्वस्थ लोकतंत्र के लिए आवश्यक है कि नागरिकों को तथ्यपरक, संतुलित और विश्वसनीय जानकारी मिले, जिससे वे सूचित निर्णय ले सकें।

आज आवश्यकता इस बात की है कि पत्रकारिता अपने मूल मूल्यों की ओर लौटे। पत्रकारों को चाहिए कि वे गति के बजाय गुणवत्ता को प्राथमिकता दें, और तथ्यों की पुष्टि के बिना किसी भी सूचना को प्रसारित करने से बचें। मीडिया संस्थानों को भी अपनी जिम्मेदारी समझते हुए टीआरपी और क्लिकबेट से ऊपर उठकर जनहित को सर्वोपरि रखना होगा। साथ ही, समाज को भी अपनी भूमिका निभानी होगी। पाठकों और दर्शकों को यह समझना होगा कि हर वायरल सूचना सत्य नहीं होती। विवेकपूर्ण दृष्टिकोण अपनाकर ही वे सही और गलत में अंतर कर सकते हैं।

यह समय आत्ममंथन का है

अंततःपत्रकारिता केवल एक पेशा नहीं, बल्कि लोकतंत्र का एक सशक्त स्तंभ है। यदि यह स्तंभ कमजोर होता है, तो उसका प्रभाव पूरे समाज और शासन व्यवस्था पर पड़ता है। इसलिए यह समय आत्ममंथन का है ताकि पत्रकारिता फिर से अपने वास्तविक स्वरूप में लौट सके और समाज को सही दिशा दिखा सके।

 

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