सीएडी,उपनिवेशन और सिंचाई विभाग पशोपेश में
MAHENDRA SIINGH SHEKHAWAT बीकानेर, (समाचार सेवा)। राज्य और केंद्र सरकार द्वारा नवीकरणीय ऊर्जा को बढ़ावा देने के उद्देश्य से सोलर परियोजनाओं का तेजी से विस्तार किया जा रहा है। सोलर ऊर्जा को भविष्य की जरूरत मानते हुए इसे प्राथमिकता देना निस्संदेह आवश्यक है, लेकिन इसके अनियोजित विस्तार ने राजस्थान के मरुस्थलीय इलाकों में एक गंभीर प्रशासनिक और सिंचाई संकट को जन्म दे दिया है। खासकर इंदिरा गांधी नहर परियोजना (आईजीएनपी) के सिंचाई तंत्र पर सोलर पार्कों के असर ने व्यवस्था को लड़खड़ा दिया है।
आईजीएनपी के माध्यम से पश्चिमी राजस्थान के लाखों हेक्टेयर क्षेत्र को सिंचित किया जाता है। इसके अंतर्गत चक निर्माण, कमांड एरिया विकास, कॉलोनाइजेशन और किसानों के पुनर्वास के लिए दशकों से योजनाबद्ध ढंग से काम होता रहा है। इस पूरी व्यवस्था को संभालने के लिए उपनिवेशन (कॉलोनाइजेशन) विभाग, सीएडी (कमांड एरिया डेवलेपमेंट) और आईजीएनपी जैसे विशाल विभाग कार्यरत हैं। लेकिन बीते कुछ वर्षों में बड़े-बड़े सोलर पार्क और निजी कंपनियों की सोलर परियोजनाएं इन्हीं सिंचित और कमांड क्षेत्रों में स्थापित हो गईं।
बीच-बीच में ब्लॉक हुआ सिंचाई सिस्टम
जानकारों के अनुसार, आईजीएनपी का पूरा सिंचाई तंत्र पहले से निर्धारित जल वितरण योजना पर आधारित है। नहरों, खालों, डिग्गियों, पंपों और मोटरों का जाल किसानों की जरूरतों को ध्यान में रखकर बिछाया गया था। अब स्थिति यह है कि जहां पानी पहुंचाने के लिए करोड़ों रुपये का इन्फ्रास्ट्रक्चर खड़ा किया गया, वहां सोलर पार्क लगने से सिंचाई की आवश्यकता ही समाप्त हो गई। कई चकों और कमांड एरिया के बीच अचानक सोलर प्रोजेक्ट आ जाने से नहरों का प्रवाह बाधित हुआ है और सिस्टम जगह-जगह से ब्लॉक हो गया है।
सरप्लस पानी बना नई समस्या
सोलर परियोजनाओं के कारण जिन क्षेत्रों में पहले नियमित रूप से पानी दिया जाता था, वहां अब पानी की मांग कम हो गई। नतीजतन, विभागों के सामने यह बड़ा सवाल खड़ा हो गया है कि सिंचाई प्रबन्धन को कैसे व्यवस्थित किया जाए? जिन क्षेत्रों के लिए पानी का आवंटन तय था, वहां अब खपत नहीं हो रही, जबकि अन्य क्षेत्रों में पानी की मांग बनी हुई है। इस असंतुलन ने पूरे नहर तंत्र की योजना को प्रभावित कर दिया है।
महंगे इन्फ्रास्ट्रक्चर का क्या होगा?
आईजीएनपी के अंतर्गत पानी को अंतिम छोर तक पहुंचाने के लिए सरकार हर महीने भारी खर्च वहन कर रही है। अनुमान के अनुसार, लगभग 200 करोड़ रुपये प्रतिमाह कर्मचारियों के वेतन पर और करीब 100 करोड़ रुपये प्रति वर्ष बिजली बिलों पर खर्च किए जाते हैं। पंपिंग स्टेशनों, मोटरों और अन्य संसाधनों के जरिए पानी पहुंचाया जाता है। अब सवाल यह उठ रहा है कि जिन क्षेत्रों में सोलर के कारण पानी की जरूरत खत्म हो चुकी है, वहां बने इस महंगे इन्फ्रास्ट्रक्चर का भविष्य क्या होगा?
कॉलोनाइजेशन और सीएडी के सामने असमंजस
सोलर परियोजनाओं के विस्तार से कॉलोनाइजेशन विभाग और सीएडी भी असमंजस की स्थिति में हैं। कॉलोनाइजेशन किस क्षेत्र में बसावट करे, यह तय करना मुश्किल हो गया है, क्योंकि जिन इलाकों को सिंचित मानकर योजना बनाई गई थी, वे अब सोलर पार्क में तब्दील हो रहे हैं। वहीं सीएडी के सामने यह प्रश्न है कि वह किस कमांड एरिया का विकास करे, जब निर्धारित कमांड क्षेत्र ही बदलते जा रहे हैं।
बंजर भूमि को क्यों नहीं चुना गया?
किसान संगठनों और क्षेत्रीय विशेषज्ञों का कहना है कि सोलर ऊर्जा आवश्यक है, इसमें कोई दो राय नहीं है, लेकिन इसके लिए उचित और दूरदर्शी प्लानिंग जरूरी थी। राजस्थान में लाखों हेक्टेयर बंजर और बारानी भूमि उपलब्ध है, जहां सिंचाई तंत्र विकसित नहीं है। यदि सोलर परियोजनाएं वहां स्थापित की जातीं, तो न तो आईजीएनपी का सिस्टम प्रभावित होता और न ही सीएडी व कॉलोनाइजेशन की योजनाएं बाधित होतीं। सिंचित क्षेत्रों में पर्याप्त पानी उपलब्ध होने के कारण वहां सोलर लाने से सरकार ने अपने ही बनाए सिस्टम को कमजोर कर दिया है।
सरकार से समन्वित नीति की मांग
विशेषज्ञों का मानना है कि यह स्थिति “सरकार ने ही सरकार को बर्बाद कर दिया” जैसी प्रतीत होती है। एक ओर जल संसाधन और सिंचाई पर अरबों रुपये खर्च किए जा रहे हैं, दूसरी ओर बिना समन्वय के सोलर परियोजनाएं उसी सिस्टम को निष्प्रभावी बना रही हैं। आवश्यकता इस बात की है कि नवीकरणीय ऊर्जा नीति और जल-सिंचाई नीति के बीच बेहतर तालमेल बनाया जाए।
आगे की राह
अब मांग उठ रही है कि सरकार तत्काल एक समग्र समीक्षा करे। सिंचित और कमांड क्षेत्रों में सोलर परियोजनाओं पर पुनर्विचार हो, बंजर भूमि को प्राथमिकता दी जाए और आईजीएनपी, सीएडी व कॉलोनाइजेशन विभागों के साथ समन्वय स्थापित किया जाए। तभी सोलर ऊर्जा और सिंचाई, दोनों लक्ष्य एक साथ पूरे हो सकेंगे और दशकों में खड़े किए गए तंत्र को बचाया जा सकेगा।


