शताब्दियों का सफर तय किया प्रेस ने अपनी स्वतंत्रता पाने तक !

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– डॉ. मेघना शर्मा

बीकानेर, (समाचार सेवा)शताब्दियों का सफर तय किया प्रेस ने अपनी स्वतंत्रता पाने तक ! ब्रिटिश भारत में प्रेस का प्रादुर्भाव और प्रेस का विकास इतना आसान नहीं था। अंग्रेजों ने प्रेस पर प्रतिबंध लगाने की वह हर संभव कोशिश की जिससे बौद्धिक वर्ग अपनी बात, अपने विचारों को आम जनता तक ज़ोर शोर से न पहुंचा सके जिससे जनता कभी ब्रिटिश सत्ता के विद्रोह में ना खड़ी हो सके।

आधुनिक भारतीय इतिहास ऐसे कई घटनाओं से भरा पड़ा है जिसमें प्रेस पर प्रतिबंध लगाने की कोशिशें ब्रिटिश सरकार द्वारा की गई किंतु अंततः प्रेस की आजादी के लिए जो लड़ाई भारतीय बौद्धिक वर्ग ने लड़ी, उसमें काफी हद तक सफलता भी प्राप्त की।

1780 में जेम्स अगस्टस हिकी ने बंगाल गजट या कलकत्ता जनरल एडवरटाइजर पत्र की शुरुआत की जिसे 1872 में सरकार की स्पष्ट आलोचना करने के कारण जप्त कर लिया गया लेकिन हिकी के इस प्रयास ने भारत में प्रेस की स्थापना तो कर ही दी।

बाद में अनेक समाचार पत्र, जर्नल प्रकाशित हुईं जैसे बंगाल जर्नल, कोलकाता क्रॉनिकल, मद्रास कोरियर, और बॉम्बे हेराल्ड इत्यादि।1799 में प्रेस एक्ट के चलते लॉर्ड वेलेजली ने भारत पर सेट हमले की आशंका के चलते सेंसरशिप लगाने का फरमान जारी किया।

1835 तक आते-आते मेटकॉफ ने प्रेस संबंधी कुछ आपत्तिजनक अध्यादेशों को वापस लिया और इसी कारण उन्हें ‘भारतीय प्रेस का मुक्तिदाता’ भी कहा गया।

हम सभी जानते हैं कि 1857 की क्रांति भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के रूप में जानी जाती है, पहचानी जाती है । इसी वर्ष पारित किए गए लाइसेंसिंग एक्ट के तहत एक ऐसा प्रतिबंध प्रेस पर लागू किया गया जिसमें पुस्तकों के प्रकाशन, वितरण समाचार पत्र व अन्य छपी हुई सामग्री को रोकने का अधिकार सरकार को प्रदान कर दिया गया।

वक्त का पहिया आगे घूमा और रजिस्ट्रेशन एक्ट 1867 अधिनियम ने प्रेस पर लगाए कुछ प्रतिबंधों में ढील प्रदान की और कहा कि सरकार को प्रतिबंधात्मक भूमिका निभाने से बचना चाहिए, किंतु सबसे प्रतिक्रियावादी अध्यादेश अगर कोई आया तो वह था वर्नाकुलर प्रेस एक्ट 1878 जिसका निर्माण देशी भाषा के समाचार पत्रों पर बेहतर नियंत्रण स्थापित करने, प्रभावी दंड देने और सरकार विरोधी लेखन के दमन हेतु किया गया था ।

इस एक्ट के प्रावधानों के अनुसार जिला मजिस्ट्रेट को यह शक्ति प्रदान की गई कि वह किसी भी देशी भाषा के समाचार पत्र के प्रकाशक/मुद्रक को बुलाकर सरकार के साथ एक ऐसे अनुबंध पत्र पर हस्ताक्षर करने को कह सकता है जिसमें वर्णित होता था कि वह सरकार के विरुद्ध किसी भी तरह की सामग्री प्रकाशित नहीं करेगा और ना ही विभिन्न धर्मों जातियों के लोगों के मध्य द्वेष फैलाने वाली सामग्री अथवा पुस्तक प्रकाशित करेगा।

इसके अलावा मुद्रक और प्रकाशक को प्रतिभूति राशि भी जमा करनी पड़ती थी जिसे अनुबंध पत्र का उल्लंघन करने पर जब्त भी किया जा सकता था। मजिस्ट्रेट का निर्णय अंतिम होता था जिसके विरुद्ध न्यायालय में अपील नहीं की जा सकती थी। देशी भाषा के समाचार पत्रों को इससे छूट मिल सकती थी जब मुद्रक प्रकाशन से पूर्व संबंधित सामग्री को सरकार के पास जमा करें।

वर्नाक्यूलर प्रेस एक्ट नाम के इस कानून को उस समय का सर्वाधिक काला कानून कहा गया था। बात आगे बढ़ी और 1908 में समाचार पत्र एक्ट पारित किया गया जिसके द्वारा मजिस्ट्रेट को यह अधिकार दिया गया कि वह आपत्तिजनक सामग्री जैसे हत्या हेतु भड़काना, हिंसा को बढ़ावा देना आदि को प्रकाशित करने वाले पत्र की संपत्ति को जब्त करने की ताकत रखता था।

1910 के भारतीय प्रेस एक्ट के अनुसार स्थानीय सरकार को यह अधिकार दिया गया कि वे रजिस्ट्रेशन के समय प्रकाशक से प्रतिभूति राशि जमा करवाए और यदि समाचार पत्र द्वारा किसी प्रकार का कोई उल्लंघन किया जाता है तो उसे जब्त कर और उसका रजिस्ट्रेशन रद्द करने का अधिकार सरकार के पास सुरक्षित रहता था।

साथ ही समाचार पत्र के मुद्रक को प्रत्येक संस्करण की दो प्रतियां स्थानीय सरकार के पास जमा करवानी पड़ती थी। कहा जा सकता है कि भारतीय प्रेस का उद्भव विकासात्मक कठिनाइयों, निरक्षरता, औपनिवेशिक प्रतिबंधों और दमन से भरा हुआ था जिसने स्वतंत्रता के विचार को लोगों तक पहुंचाया और स्वतंत्र संग्राम के लिए महत्वपूर्ण उपकरण बन गया।

महात्मा गांधी द्वारा जन आंदोलन प्रारंभ किए जाने पर सरकार ने समाचार पत्रों की स्वतंत्रता पर पूर्ण प्रतिबंध लगाए। इस संबंध में 1930 में अध्यादेश जारी किया गया और सन 1931 में अन्य कानून इंडियन प्रेस एमरजैंसी पावर्स एक्ट पारित किया गया जिसके द्वारा सरकार ने समाचार पत्रों के प्रकाशन पर अंकुश लगाने तथा उनके प्रकाशन को रोकने के संबंध में विस्तृत अधिकार प्राप्त किए।

सन 1932 के एक अन्य प्रेस कानून द्वारा इन अधिकारों और वृद्धि की गई। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान सरकार ने भारत रक्षा कानून के अंतर्गत विशेष अधिकार प्राप्त किए और समाचार पत्रों की स्वतंत्रता को पूर्णत नष्ट किया। इसके पश्चात सन 1947 में एक समिति की रिपोर्ट के आधार पर ही भारत में प्रेस की स्वतंत्रता को स्थापित किया जाना संभव हुआ,

परंतु सांप्रदायिक दंगों के कारण भारत सरकार को प्रेस की स्वतंत्रता पर अंकुश लगाने की आवश्यकता अनुभव हुई और उसने सन 1951 में एक कानून बनाया जिसके द्वारा सुरक्षा धन जमा करने, उस धन को जब्त करने, आपत्तिजनक समाचार को छापने से रोकने, प्रेस को बंद कर देने के संबंध में सरकार को विस्तृत अधिकार प्रदान किए ।

यद्यपि हानिग्रस्त प्रेस को एक जूरी मंडल से न्याय पाने का अधिकार भी दिया गया। अखिल भारतीय समाचार पत्र संपादक मंडल तथा संपादकों की अखिल भारतीय फेडरेशन ने इस कानून का घोर विरोध किया। भारत सरकार को उनकी मांगों को स्वीकार करना पड़ा और सन 1952 में न्यायाधीश जी.एस.रजाध्यक्ष  के सभापतित्व में एक प्रेस कमीशन की नियुक्ति की जिसने 1954 में अपनी रिपोर्ट दी और इसके पश्चात सरकार ने स्वतंत्र बनाए रखने के लिए विभिन्न नियम बनाए।

विश्व स्तर पर बात करें तो संयुक्त राष्ट्र संघ ने वर्ष 1993 में तीन मई को ही विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस की घोषणा की थी। उसके अनुसार यह दिन प्रेस की स्वतंत्रता के सिद्धांत, प्रेस की स्वतंत्रता का मूल्यांकन, प्रेस की स्वतंत्रता पर बाहरी तत्वों के हमले से बचाव और प्रेस की सेवा करते हुए दिवंगत हुए संवाददाताओं को श्रद्धांजलि देने के दिन के रूप में मनाया जाता है।

विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस से संबंधित मुख्य तथ्य अभिव्यक्ति की आजादी अनुच्छेद 19 के अनुसार मौलिक मानवाधिकार है प्रेस की आजादी और समाचारों को लोगों तक पहुंचा कर सशक्त हो रहे मीडिया कर्मियों का व्यापक विकास करना इसका उद्देश्य है। विश्व स्तर पर प्रेस की आजादी को सम्मान देने के लिए इस दिवस को विश्व प्रेस दिवस के रूप में भी जाना जाता है।

– डॉ. मेघना शर्मा

 * बीकानेर संपर्क : drmeghnasharma@mgsubikaner.ac.in

* लेखिका महाराजा गंगा सिंह विश्वविद्यालय, बीकानेर में इतिहास विषय की संकाय सदस्या होने के साथ साथ महिला अध्ययन केंद्र की डायरेक्टर का पदभार भी संभाल रही हैं।