आंखों वाला अफसर

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आचार्य ज्योति मित्र

बीकानेर, (samacharseva.in)। आंखों वाला अफसर, कहते हैं जो अफसर होता है उसके चार आंखें होती हैं। हमारी आंखों पर तो पर्दा गिरा हुआ था, वो तो  हमारे दोस्तों ने बताया कि अफसर के  चार नहीं चौरासी आंखें होती हैं।

हमने तो शिवजी के तीसरे नेत्र के बारे में सुना था कि उन्होंने यदि तीसरा नेत्र खोल दिया तो प्रलय आ जाती है। अब ये चौरासी आंखें सारी की सारी खुल गई तो क्या होगा,  ये सोचकर ही हमारा दिल बैठने लगता है।

यह अलग बात है कि अपने मतलब के लिए वे कभी कभी आंखें बंद भी कर लेते हैं। कई बार उनके चेले चपाटे लोगों की आंखों में मिर्ची डाल देते हैं लेकिन बंदा तब तक अपनी आंखें नही खोलता, जब तक सब कुछ सामान्य न हो जाए। अफसर का आदर्श वाक्य होता है कि आप कुछ भी करोगे, मुझे पता चल ही जाएगा।

इस बात से हमारी भी आंखें खुल गई कि कलयुग में अफसर ही त्रिकालदर्शी होते हैं। कई बार अफसर अपनी आंखों का इतना महिमा गान करते हैं कि हमें लगता कि हम तो जन्मांध हैं। यह वहम भी हो जाता है कि इनकी आंखें हैं इसीलिए ये अफसर हैं।

सही तो है बिना आंख का अफसर किस काम का ……? मुझे उनकी बातें सुनकर ऐसा ही महसूस हुआ कि अफसर बनने के लिए पढ़ाई लिखाई इतनी जरूरी नहीं है जितना कि प्राकृतिक रूप से आंखों व कान का होना जरूरी है। जिनके पास आंखें व कान  हैं, वही अफसर हो सकता है! अफसर सिर्फ आंखों का महिमागान ही नही करता बल्कि गाहे बेगाहे मीटिंग कर के आंखें दिखाता भी है।

कहते हैं कि दीवारों के कान होते हैं, होते हैं या नहीं, ये शोध का विषय हो सकता है। पुराने शोध बताते हैं कि ये दीवार वाले कान अफसर के ही काम आते हैं। वैसे सैद्धांतिक रूप से देखा जाए तो अफसर व दीवार में भेद करना मुश्किल है। विद्वान लोगों का कहना है कि अफसर दीवार की  तरह  सख्त होता है।

दीवार के उस पार देखना अफसर के अंतर्मन में झांकना, उसके मातहतों का आदिकाल से ही पसंदीदा शगल रहा है। जब हमने ये सुना कि आंखों की जुबान नहीं होती, फिर भी वे बहुत कुछ कह जाती हैं।बस उस दिन के बाद हम अफसर की आंखों के अध्ययन में जुट गए। एक विद्वान मित्र ने बताया सामुद्रिक शास्त्र में आंखों की बनावट, आकार-प्रकार, चेहरे पर उनकी स्थिति, रंग और चंचलता, गति आदि के आधार पर मनुष्य के स्वभाव या चरित्र के अध्ययन का विधान है।

इसके आधार पर यह तय किया जा सकता है कि अमुक व्यक्ति क्रूर या कपटी है अथवा शांत, निश्चछल, स्वार्थी या परोपकार की भावना से पूरित है। बस हमने आनन फानन में एक सामुद्रिक शास्त्र का गुरु बनाया व उनसे इसके टिप्स लेने जा पहुंचे। इस दौरान हम भूल गए कि अफसर की चौरासी आंखें हमारी इस हरकत को भी देख रही है ।

लेखक – ज्योति मित्र आचार्य

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